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पंकज उसी लिखावट की कमज़ोरी पर रो रहा....कविता......छंदमुक्त अतुकान्त

पीड़ा के ताप से,
पिघल रही मन की हिमानी
दो आँखें हुई हैं यमुनोत्री गंगोत्री
कंठ क्षेत्र देव प्रयाग हुआ है
जहाँ अलकनंदा और भगीरथी
की धाराएं आकर मिल रहीं
और हृदय क्षेत्र-हरिद्वार को
भिंगों रहीं

आप इसे रोना कह सकते हैं
लेकिन मैं अपना दुःख बहा रहा हूँ
अपने बैलों के साथ मर चुके किसान के प्रति
अपना फ़र्ज़ निभा रहा हूँ

शायद इससे अधिक कुछ कर नहीं सकता?

ना!!!!

सच ये है कि इससे ज्यादा कुछ करना ही नहीं चाहता

ख़ैर,
देख रहा हूँ....
उसके टूटे चप्पल, तार से सिले हुए
महसूस कर रहा हूँ...
उसके पाँव छिले हुए

अपना धर्म और कर्म तोल रहा हूँ
मैं; पंकज आज एकदम सच बोल रहा हूँ

फूँक देना चाहता हूँ धर्म की किताबें
जला देना चाहता हूँ कानून की इबारतें

वह विधान जो आज भी पाँव के छाले ढो रहा
पंकज उसी लिखावट की कमज़ोरी पर रो रहा......

मौलिक अप्रकाशित

Views: 48

Comment

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 12, 2018 at 12:54am

आदरणीया नीलम जी बहुत बहुत आभार

Comment by Neelam Upadhyaya on August 9, 2018 at 4:26pm

आदरणीय पंकज कुमार मिश्रा जी,  बहुत ही बढ़िया हृदयस्पर्शी रचना की प्रस्तुति।  बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 8, 2018 at 4:36pm

आदरणीय विजय सर बहुत बहुत आभार

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 8, 2018 at 4:35pm

आदरणीय आरिफ़ सर बहुत आभार

Comment by vijay nikore on August 8, 2018 at 12:56pm

//देख रहा हूँ....
उसके टूटे चप्पल, तार से सिले हुए
महसूस कर रहा हूँ...
उसके पाँव छिले हुए

अपना धर्म और कर्म तोल रहा हूँ//

बहुत ही अच्छा क्ड़वा सच है आपकी रचना में ... मन को छू गई। हार्दिक बधाई।

Comment by Mohammed Arif on August 8, 2018 at 12:37pm

आदरणीय पंकज मिश्रा जी आदाब,

                                नए-नए और प्रतीकों के साथ बेहतरीन अभिव्यक्ति । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on August 8, 2018 at 11:56am

ऐडिट कर दीजिए ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 8, 2018 at 12:00am

आदरणीय बाऊजी बहुत दिन बाद आना हो पाया, इसी वजह से गल्ती हो गई...

Comment by Samar kabeer on August 7, 2018 at 2:29pm

अज़ीज़म पंकज कुमार मिश्रा आदाब,बहुत उम्दा और मार्मिक कविता हुई है,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

मंच के नियमानुसार आपने कविता के अंत में अपना नाम व मौलिक व अप्रकाशित नहीं लिखा?

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