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क्या सबब था...संतोष

अरकान फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

क्या सबब था,किसलिये दुनिया से मैं डरता रहा
सर झुका कर जिसने जो भी कह दिया करता रहा


सी दिया था मेरे होटों को ज़माने ने मगर
ज़िक्र सुब्ह-ओ-शाम तेरा फिर भी मैं करता रहा


ज़िन्दगी के रास्ते में ज़ख़्म जो मुझको मिले
चुपके चुपके प्यार के मरहम से वो भरता रहा


जाते जाते वो मुझे कह कर गये थे इसलिये
लम्हा लम्हा ज़िन्दगी जीता रहा मरता रहा


सादगी की मैंने ये क़ीमत चुकाई उम्र भर
जुर्म कोई और करता दण्ड में भरता रहा

~संतोष_खिरवड़कर

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 801

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Comment by santosh khirwadkar on June 8, 2018 at 3:14pm

शुक्रिया आ. गुमनाम जी 

Comment by gumnaam pithoragarhi on June 8, 2018 at 1:26pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई.........

Comment by santosh khirwadkar on June 7, 2018 at 5:20pm

आभार आ.लक्ष्मण जी 

Comment by santosh khirwadkar on June 7, 2018 at 5:19pm

शुक्रिया आ.महेंद्र जी 

Comment by santosh khirwadkar on June 7, 2018 at 5:19pm

धन्यवाद रोहित जी 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 7, 2018 at 11:05am

आ. भाई संतोष जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Mahendra Kumar on June 6, 2018 at 10:25am

आदरणीय संतोष जी, बढ़िया ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए.

1. दूसरा शेर और बेहतर हो सकता है.

2. सादगी की मैंने ये क़ीमत चुकाई उम्र भर
    जुर्म कोई और करता क़र्ज़ मैं भरता रहा

सादर.

Comment by Rohit Dubey "योद्धा " on June 5, 2018 at 7:54pm

kya baat hai ! Lajavab kavita !

Comment by santosh khirwadkar on June 5, 2018 at 7:08pm

धन्यवाद आ.चौहान जी 

Comment by santosh khirwadkar on June 5, 2018 at 7:07pm

शुक्रिया आ.आरिफ़ साहब

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