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नारी अंतर्मन [कविता]

घर की सुखमयी ,वैभवता की ईटें सवारती,

धरा-सी उदारशील,घर की धुरी,

रिश्तों को सीप में छिपे मोती की तरह सहेजती,

मुट्ठी भर सुख सुविधाओं में ,तिल-तिल कर नष्ट करती,

स्त्री पैदा नही होती,बना दी जाती,

ममतामयी सजीव मूर्ति,कब कठपुतली बन गई,

लेकिन अब सजग हो जाओं,क्रान्ति दबे पांव आ गई,

अपनी कर्मठता से अस्तित्व की लकीरें खींच ली,

अपमान के खानों में सम्मान का ठप्पा लगा लिया,

विकास में साधक नही,पचास फीसदी वोट बन गई,

अब वह वस्तु परक नही,विषय परक बन गई,

हम बहू नही, बहुमत हैं,

फरमान सुन लो, समाज के ठेकेदारों,

अस्तित्व कल भी था ,आज भी हैं ,और कल भी रहेगा,

लेकिन यह भी सच हैं कि-

'औरत, औरत को न मारे,तो वो कभी न हारे'.

रचना मौलिक और अप्रकाशित हैं.

     बबीता गुप्ता 

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Comment

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Comment by babitagupta on May 14, 2018 at 5:56pm

सराहना करने के लिए आप सभी का सधन्यवाद. 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 29, 2018 at 7:38pm

उत्तम बहुत ही उत्तम रचना...आखरी पंक्ति संपूर्ण सार है..बधाई आदरणीया

Comment by Samar kabeer on April 28, 2018 at 10:24pm

मोहतरमा बबीता गुप्ता जी आदाब,अच्छी कविता है, बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 26, 2018 at 2:02pm

बेहतरीन आरंभ और बेहतरीन विचारोत्तेजक अंतिम पंक्ति के बीच बंधी‌ '' अंतर्मन की बात सम्प्रेषित करती बेहतरीन रचना के लिए तहे दिल से बहुत-बहुत मुबारकबाद आदरणीया बबीता गुप्ता जी।

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