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- कुण्डलिया छंद -

हो जाए कोई स्वजन, अगर  अचानक दूर।

तब निश्चित यह मानिए, है कुछ बात जरूर।।

है कुछ बात जरूर, वरन  ऐसा क्यों होता।

जो बनता अनजान, वही अपनों को खोता।।

सिर्फ जरा सी बात, चोट दिल को  पहुँचाए।

मीठे   हों यदि  बोल, गैर अपना हो जाए।।

2-

जिसके भी मन में हुआ, लेशमात्र भी दंभ।

उसका निश्चित मानिए, पतन हुआ प्रारंभ।

पतन  हुआ प्रारंभ, यही इतिहास बताता।

लेकिन मद में चूर, व्यक्ति यह समझ न पाता।

रावण   कौरव  कंस, प्रमाण  रहे  हैं  इसके।

उसका हुआ विनाश, अहं था मन में जिसके।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

**हरिओम श्रीवास्तव**

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Comment by Dr.Rama Dwivedi on April 19, 2018 at 6:27am

वाह ! बहुत ही उत्कृष्ट कुंडलियां ,बधाई आदरणीय | 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on April 18, 2018 at 8:22pm

वाह उत्तम छंद रचना आदरणीय..

Comment by Neelam Upadhyaya on April 18, 2018 at 11:10am

आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी, नमस्कार । बहुत ही कुंडलियों की प्रस्तुति पर बधाई।

Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on April 17, 2018 at 8:44pm

आदरणीय हरिओम जी बेहतरीन कुण्डलिया लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on April 17, 2018 at 12:03pm

जनाब हरिओम श्रीवास्तव जी आदाब,बहुत उम्दा कुण्डलिया छन्द रचे आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by vijay nikore on April 17, 2018 at 9:28am

बहुत ही मनमोहक। हार्दिक बधाई।

Comment by Sushil Sarna on April 16, 2018 at 8:33pm

वाह आदरणीय हरिओम श्रीवास्तव जी बहुत ही सुंदर,अर्थपूर्ण और संदेशप्रद कुंडलियों का सृजन हुआ है। हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

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