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दे सोच कर सज़ाएं गुनहगार हम नहीं - सलीम रज़ा रीवा

221   2121   1221   212 
दे सोच कर सज़ाएं गुनहगार हम नहीं
ये तू भी जानता है ख़तावार हम नहीं
-
जिस पर किया भरोसा वही दे गया  दगा
लेकिन किसी भी शख़्स से बे-ज़ार हम नहीं
-
दिल तो दिया था जान भी तुझपे निसार की
फिर क्यूँ  तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं    
-
जिनकी खुशी के वास्ते सब कुछ लुटा दिया
उफ़ वो ही कह रहे हैं वफादार हम नहीं
-
हैरत है दिल के पास थे जिनके सदा 'रज़ा'
अब तो उन्ही के प्यार के हक़दार हम नहीं
____________________
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on March 8, 2018 at 9:01pm


जिनकी खुशी के वास्ते सब कुछ लुटा दिया
उफ़ वो ही कह रहे हैं वफादार हम नहीं। वाह! वाह!!  बहुत ही उम्दा शे'र । 

दाद के साथ दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें आदरणीय सलीम रज़ा साहब ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 8, 2018 at 8:46pm

जनाब सलीम रज़ा साहिब ,बहुत ही उम्दा ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2018 at 7:28pm

आ. भाई सलीम जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by SALIM RAZA REWA on March 8, 2018 at 5:18pm
आदरणीय तेजवीर साहिब बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by TEJ VEER SINGH on March 8, 2018 at 11:49am

हार्दिक बधाई आदरणीय सलीम रज़ा साहब जी। बेहतरीन गज़ल।

जिनकी खुशी के वास्ते सब कुछ लुटा दिया.
वो आज कह रहे हैं वफ़ादार हम नहीं

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