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दो जिस्मों के मिलने भर से

दो जिस्मों के मिलने भर से

दो जिस्मों के मिलने भर से

प्यार मुकर्रर होता तो

टूटे दिल के किस्सों का

दुनियाँ में बाज़ार न होता

सागर की बाँहों में जाने

कितनी नदियाँ खो जाती हैं

एक मिलन के पल की खातिर

सदियाँ तन्हा हो जाती हैं

तस्वीरें जो भर सकती

इस घर के खालीपन को

उसके आने की खुशबू से

दिल इतना गुलज़ार ना होता |

 

दो जिस्मों के मिलने भर से---

 

बाँहों में कस लेना तो

तन का जलना भर होता है

ये वो टूटा तारा है

जिनसे उजले का छल होता है

तारों से अगर अँधेरा जाता

आँखों में फिर चाँद ना होता|

 

दो जिस्मों के मिलने भर से

 

भंवरे-तितली क्या समझेंगे

फूलों की अकुलाहट को

उड़ कर आना पीकर जाना

इसे मोहब्बत कहते हैं

दो बूंदों की ताउम्र तपस्या

स्वाति-घटाएँ हो जाती हैं

अगर प्रेम आवेश मात्र है

तो चातक का इंतजार ना होता |

 

दो जिस्मों के मिलने भर से---

 

दो गमलों में उगे हुए है

फूलों का अपने भार सम्भाले

हवा चिकोटी करती रहती

हैं गंधों का विस्तार सम्भालें

खुशबू बाँझ अगर होती तो

जीवन का विस्तार ना होता

दो जिस्मों के मिलने भर से---

सोमेश कुमार (मौलिक एवं अमुद्रित )

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Comment

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Comment by somesh kumar on March 8, 2018 at 6:26pm

रचना पर आप सबकी उपस्थिति एवं स्नेह के लिए शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2018 at 6:53pm

आद० सोमेश जी बहुत अच्छी प्रस्तुति दी है बहुत बहुत बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 28, 2018 at 12:00pm

आ. सोमेश जी, सुंदर प्रस्तुति हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by नाथ सोनांचली on February 27, 2018 at 8:03pm

आद0 सोमेश जी सादर अभिवादन। बढिया लय युक्त गीत लिखा आपने। इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार कीजिये। सादर

Comment by रक्षिता सिंह on February 27, 2018 at 5:15pm

आदरणीय  सोमेश जी, आपने  प्रेम की वास्तविकता को बहुत ही खूबसूरत अल्फाजों में पेश किया। दिली मुबारकबाद कुबूल करें।

Comment by Samar kabeer on February 26, 2018 at 9:21pm

जनाब सोमेश कुमार जी आदाब, सुंदर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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