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ग़ज़ल....मेरी आँखें और जयादा नम हो जातीं हैं-बृजेश कुमार 'ब्रज'

22     22     22    22    22    22    2
जब भी तेरी यादें जानां कम हो जाती हैं
मेरी आँखें और जियादा नम हो जाती हैं

दर्द संभालूँ आहें रोकूँ दिल को समझाऊँ
अश्क़ों की बरसातें बेमौसम हो जाती हैं

राह तुम्हारी तकते तकते आँखें पथराईं
साँसें भी चलते चलते मद्धम हो जाती हैं

रफ़्ता रफ़्ता रात चली और सवेरा आया
फिर ये होता है सोचें बरहम हो जाती हैं

उस दर पे दम तोड़ गई हर एक सदा मेरी
और सभी उम्मीदें 'ब्रज' बेदम हो जाती हैं
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 13, 2018 at 12:48pm

हार्दिक आभार आदरणीय लक्ष्मण धामी जी...स्नेह बनाये रखें...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 13, 2018 at 12:47pm

तहेदिल से शुक्रिया ज़नाब मिश्रा जी...

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 13, 2018 at 9:45am

आ. भाई ब्रजेश जी, सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Neeraj Nishchal on February 13, 2018 at 9:40am

वाह वाह बहुत ही लाजवाब बृजेश कुमार जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 11, 2018 at 1:12pm

उचित है आदरणीय तस्दीक जी सुधार करता हूँ...सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 11, 2018 at 9:18am

जनाब ब्रजेश साहिब , हैं का इस्तेमाल करके जाती है सही है जातीं नहीं। आपके मिसरे में लय बाधित हो रही है , और मिसरों से मिलकर पढ़ें ,पता चल जाएगा ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 10, 2018 at 10:40pm

आदरणीय तस्दीक जी आपकी सार्थक समीक्षा के लिए सादर धन्यवाद..चूँकि बहुवचन की बात हो रही है इसलिए जातीं हैं रखा..मैं अभी भी असमंजस में हूँ क्या ये सही नहीं है?ज्यादा को आपके बताये अनुसार सही करता हूँ।लेकिन चौथा शेर बे बह्र है ये समझ नही आ रहा है!!

रात चली 2112 को हम 222 ले सकते हैं न इस बह्र में??

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on February 10, 2018 at 8:58pm

जनाब ब्रजेश कुमार साहिब , ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है ,मुबारकबाद कुबूल फरमायें ।  शब्द जातीं को जाती और जयादा  को ज़ियादा करलें ।शेर4 उला बह्र में नहीं , यूँ कर सकते हैं "रफ्ता रफ्ता शब जाती और आता सवेरा है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 10, 2018 at 11:51am

बहुत बहुत आभार आदरणीय विजय जी...सादर

Comment by vijay nikore on February 10, 2018 at 4:47am

बहुत अच्छे एहसासों का प्रयोग किया है। हार्दिक बधाई, आ० बृजेश जी।

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