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ग़ज़ल..रात भर-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुतदारिक सालिम मुसम्मन बहर
212 212 212 212
आँख आँसू बहाती रही रात भर

दर्द का गीत गाती रही रात भर

आसमां के तले भाव जलते रहे
बेबसी खिलखिलाती रही रात भर

बाम पे चाँदनी थरथराने लगी
हर ख़ुशी चोट खाती रही रात भर

रूह के ज़ख्म भी आह भरने लगे
आरजू छटपटाती रही रात भर

प्यार की राह में लड़खड़ाये कदम
आशकी कसमसाती रही रात भर

आह भरते हुये राह तकते रहे
राह भी मुँह चिढ़ाती रही रात भर
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 11, 2018 at 10:40am

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय महाजन जी..

Comment by Harash Mahajan on February 23, 2018 at 3:28pm

वाह खूबसूरत अहसास ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 18, 2018 at 7:13pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया अनीता जी..

Comment by Anita Maurya on February 17, 2018 at 7:23am

वाह, खूबसूरत ग़ज़ल

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 13, 2018 at 12:45pm

हार्दिक अभिनन्दन है आदरणीय नीरज मिश्रा जी..

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 13, 2018 at 12:44pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सतविंद्र जी..सादर

Comment by Neeraj Nishchal on February 13, 2018 at 9:42am

क्या बात है कोई जवाब नही बहुत ही उम्दा

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 9, 2018 at 8:40pm

उम्दा अशआर कहे हैं,बधाई आदरणीय

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 9, 2018 at 7:58pm

रचना पटल पे आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं आभार आदरणीय पंकज जी..

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2018 at 4:14pm

बहुत खूब, आदरणीय

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