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ग़ज़ल (यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है )

(फाइलातुन -फइलातुन -फइलातुन -फेलुन)

यूँ नहीं मैं ने ज़माने से बग़ावत की है |
मुझ से उस शोख़ ने बे लौस मुहब्बत की है |

दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना
मैं ने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है |

मुझ से उम्मीद वफ़ा की है उसी को यारो
उम्र भर जिसने मेरे साथ अदावत की है |

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको
हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

सोच लेना वो कोई ग़ैर नहीं अपने हैं
तुमने जिनसेमेरीमहफ़िल में शिकायत की है |

यक बयक हो गये तब्दील किसी के तेवर
मुझ पे क्या ख़ूब अज़ीज़ों ने इनायत की है |

करते फिरते हैं बुराई मेरी तस्दीक़ वही
मैं ने कब ज़ाहिरा उनकी कोई फ़ितरत की है |


( मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 31, 2017 at 10:17pm

मुहतरम जनाब तेज वीर साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफज़ाई
का बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by TEJ VEER SINGH on December 31, 2017 at 6:44pm

हार्दिक बधाई आदरणीय तस्दीक अहमद खान साहब जी।आदाब ।बेहतरीन गज़ल।

रहनुमाई के लिए मैं ने चुना था जिसको 
हाए उसने भी मेरे साथ सियासत की है |

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 8:55pm

जनाब अफ़रोज़ साहिब, हर शायर के सोचने का अंदाज़ अलग होता है ,ज़रूरी नहीं कि हर शायर एक तरह से सोचे । उस शोख की हसरत करने में आशिक़ की मर्ज़ी नहीं है मगर वो अपने दिल के हाथों मजबूर है ,इस लिए ऐसा करना पड़ रहा है । बाक़ी कोई किस तरह सोचता है ,इस पर किसी का कोई अख़्तियार नहीं होता---सादर

Comment by Afroz 'sahr' on December 29, 2017 at 12:31pm
जनाब तस्दीक़ एहमद खा़न साहिब आदाब दूसरा शेर
"दिल ने मजबूर बहुत कर दिया मुझको वर्ना"
"मैंने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है"
इस शेर के ऊला मिसरे में दिल एक मर्कज़ी किरदार में है।
ये बात सच है कि इंसान दिल के हाथों मजबूर हो जाता है।
लेकिन हर मर्ज़ी और ना मर्ज़ी का फैसला दिल ही करता है।
जैसा कि ऊला मिसरे से मालूम हो रहा है।
ऊला मिसरे में कही हुई बात की सानी मिसरी ख़िलाफ़ वर्ज़ी कर रहा है। "मैने कब मर्ज़ी से उस शोख़ की हसरत की है"
में ब ज़ात ए ख़ुद की मर्ज़ी का ज़िक्र है। जो कि दिल की मर्ज़ी के अपोज़िट है। यानि कि दो, मर्जी़ का एक दिल की दूसरी ब ज़ात ए ख़ुद की मर्ज़ी ये कैसे मुमकिन है।
""मक्ता पर आपकी बात सही है"" सादर,,
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 11:27am

जनाब अफ़रोज़ साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत, मश्वरे और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ।

महरबानी करके बताने की ज़हमत करें कि शेर 2 मुहमिल कैसे है?

मेरे आखरीं शेर के सानी मिसरे  का मफ़हूम साफ है जो आपकी समझ में नहीं आ रहा है । वो मेरी  सबसे बुराई  कर रहे हैं मगर मैं ने जो उनकी फितरत है ,उसे कब लोगों में ज़ाहिर किया है , आपके मिसरे के हिसाब से फितरत की जा रही है ,फितरत की नहीं जाती , यह तो होती है हर शख़्स की 

अलग अलग । शायद आप  समझ गए होंगे ।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 29, 2017 at 10:50am

मुहतरम जनाब कालीपद साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया ।

Comment by Afroz 'sahr' on December 28, 2017 at 11:24pm
जनाब तस्दीक़ एहमद ख़ान साहिब अच्छी ग़ज़ल हुई। मुबारकबाद कुबूल करें।
दूसरा शेर मुहमिल है। पाँचवे शेर के सानी मिसरे को और कसा जा सकता है। मक्ते का सानी मिसरा "मैंने कब ज़ाहिरा उनकी कोई फ़ितरत की है। से ये भाव आ रहा है कि फ़ितरत छुपा कर की है। ये मिसरा यूँ होना चाहिए
" मैंने हरगिज़ कभी उनकी नहीं फ़ितरत की है"
Comment by Kalipad Prasad Mandal on December 28, 2017 at 10:16pm

आ तस्दीक अहमद खान साहिब ,आदाब  बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है शेर दर शेर  मुबारकबाद कुबूल करें 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 5:26pm

जनाब महेंद्र कुमार साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on December 28, 2017 at 5:25pm

जनाब सुरेन्द्र नाथ साहिब , ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

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