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मधुर दोहे :

मन के मधुबन में मिले, मन भ्र्मर कई बार।
मूक नयन रचते रहे, स्पंदन का संसार।।

थोड़ा सा इंकार था थोड़ा सा इकरार।
सघन तिमिर में हो गयी , प्रणय सुधा साकार।।

बाहुपाश से देह के, टूटे सब अनुबंध।
स्वप्न सेज महका गयी ,मधुर बंध की गंध।।


सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mohammed Arif on November 16, 2017 at 8:15am
प्रेम की सार्थक अभिव्यक्ति करते बेहतरीन दोहे । हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी ।
Comment by SALIM RAZA REWA on November 15, 2017 at 10:45pm
आदरणीय सुशील जी,
ख़ूबसूरत दोहों के लिए मुबारक़बाद.
बाहुपाश से देह के, टूटे सब अनुबंध।
स्वप्न सेज महका गयी ,मधुर बंध की गंध।। वाह

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