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अब भी क़ायम है(ग़ज़ल)- बलराम धाकड़

१२२२,१२२२,१२२२,१२२२

दिलों पर कुछ ग़मों की हुक़्मरानी अब भी क़ाइम है,
कि निचली बस्तियों में सरगरानी अब क़ाइम है।

हक़ीक़त है कि उनके वास्ते सब कुछ किया हमने,
मगर औरत के लव पर बेज़ुबानी अब भी क़ाइम है।

मैं शादी तो करुँगी, मह्र, वालिद आप रख लेना,
कि अपनी बात पर बिटिया सयानी अब भी क़ाइम है।

यक़ीनन छोड़ दी हम सबने अब शर्मिन्दगी लेकिन,
हया का आँख में थोड़ा सा पानी अब भी क़ाइम है।

धड़कना दिल ने कुछ कम कर दिया, इस दौर में लेकिन,
लहू के चंद क़तरों में रवानी अब भी क़ाइम है।


मुख़ालिफ़ ज़ुल्म के कुछ लोग जो आए हैं सड़कों पर,
ये जोख़िम ये बताता है, जवानी अब भी क़ाइम है।

ये सच है, मिल गई है उसमें अब बारूद की कुछ बू,
मगर घाटी में खु़शबू जाफ़रानी अब भी क़ाइम है।

कि धरती की हरीरी छीन ली अपनी तरक्क़ी ने, 
मग़र अम्बर की रंगत आसमानी अब भी क़ाइम है।

हमारे गाँव ने ख़ुद को बहुत महफ़ूज़ रक्खा है,
रवायत हर पुरानी से पुरानी अब भी क़ाइम है।

ज़मीनें बेच दीं सब, तर्बियत सारी बचा ली है,
हमारे पास पुरखों की निशानी अब भी क़ाइम है।

मौलिक/अप्रकाशित।

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Comment

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Comment by Balram Dhakar on December 25, 2017 at 11:29am

बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण जी।

सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 12, 2017 at 9:25am
सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।
Comment by Balram Dhakar on November 10, 2017 at 5:49pm
आदरणीय आशुतोष जी,ग़ज़ल में शिरक़त, सुखन नवाज़ी और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

सादर।
Comment by Balram Dhakar on November 10, 2017 at 5:42pm
आदरणीय धर्मेंद्र जी,ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on November 10, 2017 at 4:38pm

यक़ीनन छोड़ दी हम सबने अब शर्मिन्दगी लेकिन,
हया का आँख में थोड़ा सा पानी अब भी क़ाइम है।.....................बहुत पसंद आया 

धड़कना दिल ने कुछ कम कर दिया, इस दौर में लेकिन,
लहू के चंद क़तरों में रवानी अब भी क़ाइम है।...lलहू के चंद कतरों में ..रवानी ..सिर्फ कुछ कतरों में रवानी इस पर संशय की स्थिति में हूँ 
मुख़ालिफ़ ज़ुल्म के कुछ लोग जो आए हैं सड़कों पर,
ये जोख़िम ये बताता है, जवानी अब भी क़ाइम है।..ये भी बढ़िया लगा 

ये सच है, मिल गई है उसमें अब बारूद की कुछ बू,
मगर घाटी में खु़शबू जाफ़रानी अब भी क़ाइम है।..वाह 

कि धरती की हरीरी छीन ली अपनी तरक्क़ी ने, 
मग़र अम्बर की रंगत आसमानी अब भी क़ाइम है......आसमान के हालात भी धरती जैसे ही हो गए हैं अब तो ..

हमारे गाँव ने ख़ुद को बहुत महफ़ूज़ रक्खा है,
रवायत हर पुरानी से पुरानी अब भी क़ाइम है।...ये खुशनसीबी अब हर गाँव वाले को नसीब नहीं है 

बेहतरीन शेरो की इस ग़ज़ल पर ढेर सारी बधाई आदरणीय बलराम जी 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 10, 2017 at 2:17pm

बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीय बलराम जी, बधाई स्वीकार करें।

Comment by Balram Dhakar on November 6, 2017 at 6:28pm
आदरणीय अजय जी,ग़ज़ल में शिरक़त और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर
Comment by Balram Dhakar on November 6, 2017 at 6:27pm
आदरणीय ब्रजेश जी,
हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
सादर
Comment by Balram Dhakar on November 6, 2017 at 6:26pm
आदरणीय समर सर, ग़ज़ल में आपकी शिरक़त और हौसला अफ़जाई का बहुत बहुत शुक्रिया।
आपकी समझाइश और सुझाव हमेशा ही बेशकीमती और इसीलिये शिरोधार्य होते हैं।
सादर।
Comment by Ajay Tiwari on November 6, 2017 at 10:57am

आदरणीय बलराम जी,
अच्छी ग़ज़ल हुई है हार्दिक शुभकामनाएं.
सादर

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