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इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं (ग़ज़ल 'राज')

बहरे रमल मुसम्मिन मख़बून महजूफ़ मक़तूअ--    

2122   1122  1122  22 

एक चेह्रे पे कई चेह्रे लगा रक्खे हैं 
इस ज़माने से कई राज़ छुपा रक्खे हैं 

अश्क आँखों में लिये और हँसी चेह्रे पर 
दर्द हमने कई सीने में दबा रक्खे हैं 

टूट जाएँ न कहीँ अश्क जमीं पर गिरकर 
अपनी पलकों पे करीने से सजा रक्खे हैं 

इस ज़माने को कभी ख्वाब मेरे रास आएँ 
सोचकर अपनी इन आँखों में बसा रक्खे हैं 

दे न पाएगा ज़माना कभी जिनके उत्तर 
दिल ही दिल में वो सवालात दबा रक्खे हैं 

पार होगा ये सफीना मेरा कैसे मौला 
जिंदगी ने कई तूफान उठा रक्खे हैं 

जिंदगी लौट के फिर आ कभी अपने घर पर 
हमने चौखट पे कई दीप जला रक्खे हैं 
---- मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on October 2, 2017 at 6:09pm
आ0 राजेश कुमारी जी बहुत सुंदर ग़ज़ल। हृदय से बधाई।
Comment by Samar kabeer on October 2, 2017 at 2:44pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by नाथ सोनांचली on October 2, 2017 at 4:34am
आद0 बहन राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, दर्द और आशाओं के मिश्रण से सजे अशआर के लिए बधाई।
Comment by नाथ सोनांचली on October 2, 2017 at 4:34am
आद0 बहन राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, दर्द और आशाओं के मिश्रण से सजे अशआर के लिए बधाई।
Comment by Mohammed Arif on October 1, 2017 at 10:27pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी आदाब, ग़ज़ल में दर्द भी है तो आशा का संचार करती रश्मियाँ भी । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल करें ।

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