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ग़ज़ल - वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

बह्र : 2122-1122-1122-112/22

फिर मुहब्बत से लिया नाम तुम्हारा उसने
वार मुझ पर है किया कितना करारा उसने

मेरी कश्ती को समन्दर में उतारा उसने
और फिर कर दिया तूफ़ाँ को इशारा उसने

डूबते वक़्त दी आवाज़ बहुत मैंने मगर
बैठ कर दूर से देखा था नज़ारा उसने

आप कहते थे इसे बख़्श दो, देखो ख़ुद ही
मुझ में ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसने

ग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ 

वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने

मेरी तस्वीर पे तस्वीर बना कर ख़ुद की
अक्स अपना मेरे अन्दर से उभारा उसने

दाँव पर ख़ुद को लगा बैठा मुहब्बत में वो
अब तलक जो भी था जीता हुआ हारा उसने

आप के कहने पे बख़्शा था उसे, लो देखो
मुझ में ख़ंजर ये उतारा है दुबारा उसने

जला कर राख़ मैं कर दूँगा क़सम से ख़ुद को 

मेरे अन्दर से जो अब मुझको पुकारा उसने

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 8:28pm

सादर आदाब आ. समर सर. ग़ज़ल में शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई के लिए आपका बहुत-बहुत आभार. आपसे निवेदन है कि आ. निलेश सर की टिप्पणी मेरे प्रयुत्तर को एक बार आप भी देख लीजिएगा. एक और आग्रह है कि चौथे शेर में मैं कुछ ऐसा कहना चाहता था कि "तुमने मुझे समझाया था न कि उसको उसकी भूल (अपराध) के लिए लिए माफ़ कर दो, देख लिया नतीजा. आज उसने मुझ पर दोबारा वार किया है." किन्तु मुआफ़ शब्द की वजह से कह नहीं पाया जिसका प्रयोग या तो इस बह्र के अन्त में हो सकता था या अलिफ़-वस्ल के द्वारा. यदि इस शेर का उला मिसरा किसी तरह इस बात को कह पाए तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी. आपके सुझाव की प्रतीक्षा रहेगी. यह निवेदन आ. निलेश सर से भी है. बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर आभार.

Comment by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 8:18pm

आ. निलेश सर, ग़ज़ल की इतनी अच्छी इस्लाह के लिए आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ. 

1. इस मिसरे में तो आपने जान ही डाल दी : दाँव पर ख़ुद को लगा बैठा मुहब्बत में वो

2. इस त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार : मुझ में

3. क्या अब मिसरा ठीक है : फूँक डालूँगा किसी रोज़ कहीं पर ख़ुद को

4. कृपया इस मिसरे : वार मुझ पर है किया कितना करारा उसने; और इस शेर : डूबते वक़्त दी आवाज़ बहुत मैंने मगर, बैठ कर दूर से देखा था नज़ारा उसने; पर थोड़ी और रौशनी डालने का कष्ट करें जिससे मैं यह आश्वस्त हो सकूँ मैं जो समझ रहा हूँ वह सही समझ रहा हूँ या नहीं ताकि भविष्य में इन त्रुटियों से बचा जा सके. यह निवेदन आपके साथ-साथ आ. समर सर से भी है. 

कृपया ऐसे ही स्नेह बनाए रखें. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद. सादर आभार.

Comment by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 8:16pm

आ. अफरोज़ जी, ऐसा पहली बार हुआ है जब मैं बह्र लिखना भूल गया. इसकी बह्र ओबीओ लाइव तरही मुशायरे के 87वें अंक वाली (रमल मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ / 2122-1122-1122-112/22) ही है. ग़ज़ल में संशोधन के वक़्त मैं इस ग़ज़ल के साथ लिख दूँगा. त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने और ग़ज़ल में उपस्थित हो कर उसका मान बढ़ाने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया. सादर.

Comment by नाथ सोनांचली on September 26, 2017 at 8:16pm
आद0 महेंद्र जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल पर मेरी बधाई स्वीकार करें। सादर
Comment by Mahendra Kumar on September 26, 2017 at 8:12pm

हौसला अफ़ज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आ. मोहम्मद आरिफ़. जी. हार्दिक आभार. सादर.

Comment by Niraj Kumar on September 26, 2017 at 7:12pm

आदरणीय महेंद्र जी,

उम्दा ग़ज़ल हुई है. दाद के साथ मुबारकबाद.

संकलन में आप की तरही ग़ज़ल देखी और सच पूछिए तो वो इस ग़ज़ल से भी अच्छी लगी. 

सादर 

Comment by Samar kabeer on September 26, 2017 at 5:45pm
जनाब महेन्द्र कुमार जी आदाब,ओबीओ के पुराने तरही मिसरे पर ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।
जनाब निलेश जी की इस्लाह से सहमत हूँ ।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 26, 2017 at 11:25am

आ. महेंद्र जी,
बहुत  अच्छी ग़ज़ल हुई है ..कुछ बारीक़ बातें आपके संज्ञान में लाना चाहता हूँ 
मुझ पर किया है कितना करारा उसने.........
वार मुझ पर है किया कितना करारा उसने
डूबते वक़्त बहुत मैंने दी आवाज़ मगर ........डूबते वक़्त दी आवाज़ बहुत मैंने मगर 
बैठ कर दूर से ही देखा नज़ारा उसने........ ..बैठ कर दूर से देखा था नज़ारा उसने
मुझपे ख़ंजर .... मुझ में 
.
ग़ैर भी कोई गुज़ारे न किसी ग़ैर के साथ 
वक़्त कुछ ऐसा मेरे साथ गुज़ारा उसने.. हासिल ए ग़ज़ल शेर 
दाँव पर ख़ुद को लगाया जो मुहब्बत में तो....... दाँव पर ख़ुद को लगा बैठा मुहब्बत में वो 
फूँक डालूँगा किसी रोज़ जला कर ख़ुद को ..
दोनों एक ही बात है ..मिसरा फिर कहने का प्रयास कीजिये 
सादर 

Comment by Afroz 'sahr' on September 26, 2017 at 11:06am
आदरणीय महेंद्र कुमार जी अच्छी रचना पर बधाई आपको ।आपने मंच के नियमानुसार अर्कान नहीं लिखे हैं । बाकी गुणीजनों की राय आ ही जाएगी।सादर,,,
Comment by Mohammed Arif on September 26, 2017 at 10:44am
आदरणीय महेंद्र कुमार जी आदाब, बहुत ही मारक क्षमता वाली ग़ज़ल का तोहफ़ा दिया आपने । हर शे'र माक़ूल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजनों के आने का इंतज़ार करेंं ।

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