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ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

ग़ज़ल (अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम )

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(फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन -फ़ाइलुन)

 

अपनी तक़दीर फिर आज़माएँगे हम |

उनके कुचे से वापस न जाएँगे हम |

 

ज़ुल्म कितने भी ढा ले सितमगार तू

ग़म के हर दौर में मुस्कराएँगे हम |

 

आपको तो अज़ीज़ों से फ़ुर्सत नहीं

किस तरह हाल दिल का सुनाएँगे हम |

 

जब भी मिलता है देता है वो ज़ख़्मे नौ

दस्त उलफत का कब तक मिलाएँगे हम |

 

जब तअस्सुब की आँधी चलाएँगे वो

तब चरागे मुहब्बत जलाएँगे हम |

 

हाकिमे वक़्त आवाज़ ,हक़ के लिए

चाहे अंजाम कुछ हो उठाएँगे हम |

 

वक़्ते रुखसत है सीने से लग जाइए

लौट कर अब न तस्दीक़ आएँगे हम |

 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by शिज्जु "शकूर" on September 16, 2017 at 5:55pm

अच्छी ग़ज़ल हुई है मोहतरम तस्दीक अहमद खान साहब, बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 16, 2017 at 1:38pm

बहुत ख़ूब ..अच्छी ग़ज़ल हुई है ..कूचा कर लें..टाइपिंग में कुचा हो गया है 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 15, 2017 at 8:47pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब ,ग़ज़ल में आपकी शिरकत और हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया
Comment by SALIM RAZA REWA on September 15, 2017 at 1:20pm
आली जनाब तस्दीक़ साहिब,
मत्ले से मक्ते तक ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद,

कृपया ध्यान दे...

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