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ग़ज़ल - शर्मिन्दा कर रहा है कोई " सलीम रज़ा

.221 2121 1221 212

..................................

अपने हसीन रुख़ से हटा कर निक़ाब को,  

शर्मिन्दा  कर  रहा  है  कोई माहताब को 

.

कोई  गुनाहगार   या   परहेज़गार    हो,

रखता है रब सभी केअमल के हिसाब को 

.

उनकी निगाहे नाज़ ने मदहोश कर दिया,

मैं  ने  छुआ  नहीं है क़सम से शराब को 

.

दिल चाहता है उनको दुआ से नावाज़ दूँ,

जब देखता हूँ बाग में खिलते गुलाब को 

.

ये ज़िन्दगी तिलिस्म के जैसी है दोस्तो,

क्या देखते नहीं हो बिखरते हुबाब को 

.

जुगनू मुक़ाबले पे न आ जाएं अब कहीं,

इस बात ने परेशां किया आफ़ताब को 

.

इन्सान  बन  गया है "रज़ा" आदमी से वह,

दिलसे पढ़ा है जिसने ख़ुदा की किताब को 

.........................................

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 14, 2017 at 7:52pm
इस उम्दा रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सादर
Comment by SALIM RAZA REWA on September 14, 2017 at 7:38am
आ. बहन कल्पना भट्ट जी,
ग़ज़ल पसंद करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया,
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 13, 2017 at 10:42pm

ये ज़िंदगी तिलिस्म की तरहा है दोस्तो ”

क्या देखते नहीं हो बिखरते हुबाब को ”

.

जुगनू मुक़ाबले पे न आ जाएं अब कहीं ”

इस बात ने परेशां किया आफ़ताब को ” बहुत खूब आदरणीय | हार्दिक बधाई |

Comment by SALIM RAZA REWA on September 13, 2017 at 10:10pm
बहुत बहुत शुक्रिया अफरोज भाई साहब,
Comment by Afroz 'sahr' on September 13, 2017 at 4:51pm
जनाब सलीम रज़ा सहब बहुत अच्छे अच्छे शेर कहे आपने इस ग़ज़ल में ! ख़ास तौर से मक्ता दिल को छु गया ! बहुत बहुत बधाई आपको
Comment by SALIM RAZA REWA on September 13, 2017 at 3:29pm
अली जनाब समर साहब,
आपका हुक्म सर आँखों पर, आपकी मुहब्बत के लिए शुक्रिया,
Comment by Samar kabeer on September 13, 2017 at 2:53pm
जनाब सलीम रज़ा साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
'वह हो गुनाहगार या परहेज़गार हो'
इस मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है'वह हो',और तक़ाबुल-ए-रदीफ़ भी है, तक़ाबुल-ए-रदीफ़ चूँकि जुज़्वी है इसलिए चल जायेगा,ऐब-तनाफ़ुर निकालने के लिये मिसरा यूँ कर सकते हैं :-
'कोई गुनाहगार या परहेज़गार हो'

'ये ज़िन्दगी तिलिस्म की तरहा है दोस्तो'
इस मिसरे में 'तरहा'शब्द ग़लत है,सही या तो 'तरह'होता है या 'तर्ह',इस मिसरे को यूँ किया जा सकता है :-
'ये ज़िन्दगी तिलिस्म के जैसी है दोस्तो'
एक बात ये कि हर मिसरे के अंत में इन्वर्टेड कामा न लगाया करें ।

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