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ये क्या है जो मुझे चलाती?

कभी मंद कभी तेज भगाती

क्या पाया क्या पाना चाहा,

हरदम मुझको याद दिलाती

विधना ने क्रंदन दुःख लिखा,

यह प्रेरित करती हर्षाती

कभी शिथिल होकर बैठा जो,

उत्प्रेरित कर मुझे जगाती

जलते जीवन में भी हँसकर,

बढ़ते जाना मुझे सिखाती

बीत समय जाएगा इक दिन,

यह धनात्मक सोच दिखाती

कहकर क्या मैं इसे पुकारूँ?

जिजीविषा यूँ तो कहलाती

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 22, 2017 at 8:15pm

आदरणीय श्री Ravi Shukla जी, हार्दिक धन्यवाद एवं सादर नमस्कार। असल बात ये है कि विधाओं की समझ अभी तक मुझे नहीं हुई है, बस जो बातें मन में आतीं हैं उनको पद्य में लिखने की कोशिश करता हूँ। प्रयासरत हूँ कि थोड़ा समय निकाल कर छंद, विधा आदि के बारे में कुछ ज्ञान अर्जित कर लूँ।

Comment by Ravi Shukla on August 22, 2017 at 5:16pm

अादरणीय किशोर जी आपकी रचना प्रस्‍तुति के लिये बधाई आपने इसे किस विधा में लिखा है यदि गजल है तो उसके अरकान पहले लिख देते आप तो इस पर और भी चर्चा हो जाती अभी इसका कोई स्‍पष्‍ट स्‍वरूप नहीं समझ आ रहा ।

Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 21, 2017 at 9:33pm

Samar kabeer  साहब, हार्दिक आभार! सादर नमस्कार।

Comment by Samar kabeer on August 21, 2017 at 6:26pm
जनाब श्याम किशोर सिंह'क़रीब'जी आदाब,इस सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 20, 2017 at 10:52pm
प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार श्रीमान सुरेंद्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप जी।
Comment by नाथ सोनांचली on August 20, 2017 at 3:21pm
आद0 श्याम किशोर सिंह जी जिजीविषा को परिभाषित करती उम्दा सृजन पर बधाई

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