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212  212  212  212

सज सँवर अंजुमन में वो गर जाएँगे I
नूर परियों के चेहरे   उतर जाएँगे II

जाँ निसार अपनी  है तो उन्हीं पे सदा ,
वो कहेंगे जिधर  हम उधर जाएँगे I

ऐ ! हवा मत करो  ऐसी अठखेलियाँ ,

उनके चेहरे पे गेसू बिखर  जाएँगे I

 

पासवां कितने  बेदार हों हर तरफ ,

उनसे मिलने को हद से गुजर जाएँगे I

है मुहब्बत का तूफां जो दिल में भरा ,
उनकी नफ़रत के शर बे-असर जाएँगे I

बेरुखी उनकी अपनी बनी  बेखुदी ,

होगी नजर-ए-इनायत सुधर जाएँगे I

 

पावती खत की कासिद ले आना सँभाल ,  

दिल दिया हमने वो तो मुकर जाएँगे I

लड़ते लहरों से जो भी रहे हैं सदा ,
हों भँवर जितने भी पार कर जाएँगे I

लाख पहरे हों बेशक तो होते रहें ,
हम हैं परबाने ‘कंवर’ निडर जाएँगे I

"मौलिक एवं अप्रकाशित"

कंवर करतार 

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Comment by Samar kabeer on August 22, 2017 at 10:11pm
भाई,'समीर' नहीं "समर" ।
Comment by कंवर करतार on August 22, 2017 at 10:09pm

जनाब समीर साहब ,आपके उम्दा सुझाव सर माथे पर Iग़ज़ल पर नजर एवं जर्रा नवाजी के लिए तहेदिल से शुक्र गुजार हूँ Iसादर आभार I   

Comment by Samar kabeer on August 21, 2017 at 6:23pm
जनाब डॉ.कंवर करतार साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के सानी मिसरे में 'नूर'की जगह "देख"कर लें तो हुस्न बढ़ जायेगा ।
'ऐ!हवा मत करो ऐसी अठखेलियां'
इस मिसरे में 'हवा'एक वचन है और 'करो'शब्द बहुवचन के लिये होता है,इस मिसरे को यूँ कर सकते हैं :-
'ऐ हवा तू न कर ऐसे अठखेलियां'
चौथे शैर के ऊला मिसरे में 'पासवाँ'को "पासबाँ" कर लें ।
आख़री शैर के सानी मिसरे में 'परबाने'को "परवाने" कर लें ।
Comment by कंवर करतार on August 20, 2017 at 9:59pm

भाई लक्ष्मण धामी जी दाद के लिए तहेदिल से आभार I

Comment by कंवर करतार on August 20, 2017 at 9:58pm

मोहतरम सुरेद्र नाथ जी ,हौसलाअफजाई के लिए आभार I

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 20, 2017 at 9:07pm
हार्दिक बधाई...
Comment by नाथ सोनांचली on August 20, 2017 at 3:25pm
आद0 डॉ.कंवर करतार 'खन्देह्ड़वी' जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल कहीं आपने, शेष गुणीजन जाने,हमे तो अच्छी लगी। बधाई
Comment by नाथ सोनांचली on August 20, 2017 at 3:23pm
आद0 डॉ.कंवर करतार 'खन्देह्ड़वी' जी सादर अभिवादन, बहुत उम्दा ग़ज़ल कहीं आपने, शेष गुणीजन जाने,हमे तो अच्छी लगी। बधाई

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