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दिल जिन्हें ढूंढे, वो हालात कहाँ

खाली दिल में वो है जज्बात कहाँ

बस एक रस्म निभा देते हैं

अब वो पहले सी मुलाक़ात कहाँ

लॉन शहरों में खूबसूरत हैं

गांव की उसमें मगर बात कहाँ

वक़्त बस यूँ ही गुजर जाता है

अब वो दिन और अब वो रात कहाँ

कभी शामिल थे जिनकी हर शै में

उनके अब ऐसे, खयालात कहाँ !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on August 5, 2017 at 6:08pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, बिलकुल प्रयास रहेगा 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 5, 2017 at 5:53pm

आ० विनय जी . हिंदी के लिहाज से यह  गीत नहीं है . आ० समर कबीर साहिब ने ठीक कहा यह गजल की तरह कही गयी  है , उम्मीद है अगली  बार मुकम्मिल गजल से मुलाकात होगी . सादर .

Comment by विनय कुमार on August 5, 2017 at 2:38pm

बेहद शुक्रिया आ मोहतरम समर कबीर साहब, धन्यवाद इस सुझाव के लिए| आशा है आगे भी आप मार्गदर्शित करते रहेंगे 

Comment by Samar kabeer on August 5, 2017 at 2:25pm
आपकी फ़रमाइश जनाब तस्दीक़ साहिब ने पूरी कर दी है,बस ये शैर यूँ करलें :-
'पारकें शहरों की सुंदर हैं बहुत
गांव सी उनमें मगर बात कहाँ'
इसमें 'पारकें'शब्द अच्छा नहीं लग रहा इसे यूँ होना चाहिए:-
"बाग़ शहरों में भी सुंदर हैं बहुत
गांव सी उनमें मगर बात कहाँ'
Comment by विनय कुमार on August 5, 2017 at 2:04pm

बहुत बहुत आभार आ गजेन्द्र श्रोतीय जी 

Comment by विनय कुमार on August 5, 2017 at 2:04pm

आ मोहतरम तसदीक़ अहमद ख़ान साहब, बहुत बहुत धन्यवाद आपका, मेरी रचना पर इतनी मेहनत करने के लिए| अब यह एक मुकम्मल गज़ल बन गयी है तो इसको रख लेते हैं| शुक्रिया आपका 

Comment by Gajendra shrotriya on August 5, 2017 at 1:06pm
आ० विनयकुमार जी आप अपने बेशकीमती खयालों को गीत गजल जो चाहे रुप दे सकते हैं। ओबीओ इसके लिए बेहतरीन माध्यम है। मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार करें।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on August 5, 2017 at 12:30pm
जनाब विनय कुमार साहिब ,ग़ज़ल जैसी ही गीत की अच्छी कोशिश हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें। आपके गीत को ग़ज़ल बनाने की कोशिश की है ,सही लगें तो रख लीजियेगा।
उनसे मिलने के हैं हालात कहाँ।
मेरे क़ाबू में हैं जज़्बात कहाँ।
रस्म मिलने की निभाते हैं सभी
अब वह पहले सी मुलाक़ात कहाँ।
पारकेँ शहरों की सुन्दर हैं बहुत
गावं सी उन में मगर बात कहां।
वक़्त तो यूँ ही गुज़र जाता है
अब वो दिन हैं कहाँ वह रात कहाँ।
जो मिलाते थे कभी हाँ में हाँ
उनके अब ऐसे ख़यालात कहाँ।
Comment by विनय कुमार on August 5, 2017 at 10:59am

शुक्रिया आ मोहतरम समर कबीर साहब, क्या मैं आपसे इस गीत को गज़ल में बदलने की गुजारिश कर सकता हूँ|

Comment by Samar kabeer on August 5, 2017 at 10:37am
ग़ज़ल के बारे में पटल पर आलेख मौजूद हैं,उनका अध्यन करें ।

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