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मेरा कच्चा मकान क्या करता (ग़ज़ल 'राज')

२१२२  १२१२    २२

बात खाली मकान क्या करता

दास्ताँ वो बयान क्या करता 

 

पंख कमजोर हो गये मेरे  

लेके अब  आसमान क्या करता 

उसकी  सीरत ने छीन ली सूरत

उसपे सिंघारदान क्या करता 

 

रूठ जाते मेरे सभी अपने

चढ़के ऊँचे मचान क्या करता

 

नींव में झूठ की लगी दीमक 

लेके ऐसी दुकान क्या करता

 

बाढ़ में ढह गये महल कितने    

मेरा कच्चा मकान क्या करता

 

मौन सब थे निजाम की सुनकर

मैं चलाकर  जुबान क्या करता

 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

 

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Comment

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Comment by Rajeev Sharma "Raj" on September 6, 2017 at 11:28am

बाढ़ में ढह गये महल कितने    

मेरा कच्चा मकान क्या करता

बहुत खूब जी , लाज़वाब 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 14, 2017 at 8:48am

बहुत बहुत शुक्रिया आद० आशीष श्रीवास्तव जी 

Comment by Ashish shrivastava on August 13, 2017 at 10:06pm
बेहतरीन ग़ज़ल है , आदरणीया ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 1, 2017 at 6:27pm

आदरणीय सी एम उपाध्याय जी आपको ग़ज़ल पसंद आई बहुत बहुत आभार शुक्रिया |

Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on August 1, 2017 at 2:03pm

आदरणीया  rajesh kumari जी ,
वाह वाह ! क्या खूब ग़ज़ल कही है !! मेरी दिली बधाई स्वीकार करें | 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 29, 2017 at 12:15pm

आद० विजय निकोर जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से बहुत आभारी हूँ |

Comment by vijay nikore on July 24, 2017 at 11:34am

बहुत ही खूबसूरत गज़ल कही है, आदरणीया राजेश जी। हार्दिक बधाई।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 7:37pm

आदरणीय योगराज जी ,मेरी इस ग़ज़ल को फीचर करने के लिए कोटि कोटि आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 7:34pm

आद० हरि प्रकाश दूबे जी ,आपका बहुत बहुत आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 16, 2017 at 7:32pm

मोहतरम जनाब तस्दीक अहमद जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया 

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