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कोई रिश्ता निभाया जा रहा है

मापनी -१२२२ १२२२ १२२

कोई रिश्ता निभाया जा रहा है

मुझे फिर से बुलाया जा रहा है

 

भले ही खिड़कियाँ हैं बंद घर की,

मगर परदा उठाया जा रहा है

 

पड़ीं हैं नींव में चुपचाप ईंटे,

भले बोझा बढाया जा रहा है

 

अभी कुछ शांत हैं लहरें वहाँ पर,

उन्हें पत्थर दिखाया जा रहा है

 

नहीं है पास उनके एक छत भी,

महल का गीत गाया जा रहा है

 

बिठाना था जिन्हें पलकों पे’ हर पल,

उन्हें घर से भगाया जा रहा है

 

जरा सा हाथ सूरज का हटा क्या,

कि मुझसे दूर साया जा रहा है

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Samar kabeer on May 9, 2017 at 5:48pm
जनाब बसंत कुमार शर्मा जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 9, 2017 at 4:26pm

आदरणीय बसंत शर्मा जी अच्छी ग़ज़ल हुई है बहुत बहुत बधाई आपको

Comment by Sushil Sarna on May 9, 2017 at 4:22pm

जरा सा हाथ सूरज का हटा क्या,
कि मुझसे दूर साया जा रहा है

वाह बहुत सुंदर आदरणीय बसंत जी ... इस बेहतरीन अहसासों वाली ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 9, 2017 at 3:36pm

आदरणीय Ravi Shukla जी हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 9, 2017 at 3:35pm

आदरणीय योगराज प्रभाकर जी, आपने मेरी गजल को समय दिया और त्रुटि की ओर ध्यानाकर्षित किया, बहुत बहुत धन्यवाद आपका, यह टंकन त्रुटि ही है सादर , सुधर कर देता हूँ. 

Comment by बसंत कुमार शर्मा on May 9, 2017 at 3:34pm

आदरणीय  Mohammed Arif  जी हौसलाफजाई के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपका

Comment by Ravi Shukla on May 9, 2017 at 3:27pm

आदरणीय बसंत जी बढि़या गजल कही आपने मुबारक बाद कुबूल करें अरकान आदरणीय योगराज भाई जी ने बताए है वही है टंकण त्रुटि हो तो सुधार लीजिये । सादर


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 9, 2017 at 2:34pm

ग़ज़ल के अरकान दोबारा जांच लें आ० बसंत कुमार शर्मा जी, १२२२ १२२२ १२ की बजाय १२२२ १२२२ १२२ है शायद. 

Comment by Mohammed Arif on May 9, 2017 at 1:39pm
आदरणीय बसंत शर्मा जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ क़ुबूल करें ।

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