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ग़ज़ल: सूखे-सूखे जंगल अब

बह्र-22/22/22
सूखे-सूखे जंगल अब,
रूठे-रूठे बादल अब ।

.
वादे, नारे सब झूठे,
बदले-बदले हैं दल अब ।

.

देखो किसकी साज़िश है,
रिश्ते-नाते घायल अब ।

.

बोतल में ऊँचे दामों,
बिकता है गंगा जल अब ।

.

ग़रीब के घर भी यारों,
ख़ुशियों वाला हो पल अब ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Mahendra Kumar on May 15, 2017 at 11:52am

बढ़िया ग़ज़ल है आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. सादर.

Comment by Mohammed Arif on May 9, 2017 at 1:30pm
ग़ज़ल की सराहना और हौसला अफज़ाई कि बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ।
Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 10:25pm
आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब ग़ज़ल की सराहना और हौसला आफज़ाई का शुक्रीया । आगामी ग़ज़ल में ध्यान रखूँगा ।

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Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 9:56pm

आदरणीय आरिफ भाई ,  छोटी बहर मे बहुत अच्छी गज़ल कही है आपने , बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 9:51pm
जनाब मोहम्मद आरिफ़ साहिब आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
एक बात ये कि ग़ज़ल का हर शैर इकाई का दर्जा रखता है,इसलिये ग़ज़ल का कोई शीर्षक नहीं होता ।
Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 3:17pm
आदरणीय तस्दीक़ अहमद जी आदाब,ग़ज़ल की सराहना और इस्लाह का बहुत-बहुत शुक्रिया ।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on May 8, 2017 at 2:23pm
मुहतरम जनाब आरिफ साहिब,छोटी बह्र में अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबाकबाद क़ुबूल फरमायें ----आखरी शेर उला में गरीब की जगह मुफ़लिस करके देखिए
Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 1:20pm
बहुत-बहुत आभार और इस्लाह के लिए शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी ।
Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 1:18pm
ग़ज़ल सराहना और हौसला आफज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय नीलेश जी ।
Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 1:18pm
ग़ज़ल सराहना और हौसला आफज़ाई का बहुत-बहुत शुक्रिया आदरणीय नीलेश जी ।

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