For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

 221 2121 1221 212

 

बदनाम है जरूर मगर नाम तो हुआ 

अफसाना जिदगी का सरे आम तो हुआ

 

आँखों में बंद था कभी सागर शराब का  

वह तज्रिबे आशिक से लबे जाम तो हुआ

 

महफिल थी जम गयी उनके खयाल की  

था जश्न थोड़ी देर पर दिल-थाम तो हुआ

 

उतरा था एक बार मुहब्बत की जंग में

नाकाम जंग होना था नाकाम तो हुआ   

 

कहते है यार इश्क है अंजाम-बद बहुत

होना था जो अंजाम वो अंजाम तो हुआ

 

उसको न कुछ मिला तो मुझे भी कहाँ मिला

यह बेक़सूर व्यर्थ में बदनाम तो हुआ

 

नाकाम जो मुहब्बत हो गयी तो क्या करें 

दीवाना कह रहा था भई काम तो हुआ .

 

मरहम बना तमाम वक्त बीत जो गया

जख्मे-जिगर के दर्द को आराम तो हुआ

 

 (मौलिक/अप्रकाशित )

 

Views: 793

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Mohammed Arif on February 16, 2017 at 5:47pm
आदरणीय गोपाल नारायण जी आदाब, बेहतरीन ग़ज़ल , मुबारकबाद क़ुबूल करें । आदरणीय रवि शुक्ला जी ने अच्छी इस्लाह कर दी है । मैं उनकी बात से सहमत हूँ ।
Comment by दिनेश कुमार on February 16, 2017 at 5:22pm
अच्छी ग़ज़ल वाह वाह आली जनाब गोपाल सर। आदरणीय रवि जी ने बहुत उम्दा विश्लेषण किया है। बहुत कुछ सीखने को मिला। वाह। आभार उनका।
Comment by Ravi Shukla on February 16, 2017 at 2:39pm

आदरणीय डाक्‍टर गोपाल नारायण जी  इस आंहग खेज बहर पर आपकी खूबसूरत गजल पढ कर बहुत अच्‍छा लगा शेर दर शेर दाद और मुबारक बाद कुबूल करें

बदनाम है जरूर मगर नाम तो हुआ 

अफसाना जिदगी का सरे आम तो हुआ  अच्‍छा मतला हुआ है इसके कथ्‍य के लिये ढेर सारी बधाई , क्‍योंकि गजल में सब कुछ पहले से ही लोग कह चुके है उसी बात को नये तरीके से कहना होता है  और आपने मतले में उसी  परंपरा को सफल निर्वाह किया है । हालांकि अगर और गहरे में जाए तो बदनाम है जरूर एक घोष्‍णात्‍मक कथन है वर्तमान की घटना है और आगे नाम तो हुआ, हो चुकी घटना है इस लिये दोनो को ण्‍क ही समय मे कहा जाए तो हमारे ख्‍याल से बात और भी खूबसूरत हो सकती है ।

बदनाम हो गया हूँ मगर नाम तो हुआ .... हमारी विनम्र राय मे एेसे भी कहा जा सकता है

 

आँखों में बंद था कभी सागर शराब का  

वह तज्रिबे आशिक से लबे जाम तो हुआ वाह वाह वाह क्‍या बात कही है डाक्‍टर साहब कमाल का नजरिया है । तज्रिवे आशिक  इस लफ्ज की तरकीब पर समर साहब और अन्‍य उदॅू दां आलिम की राय जानना चाहेगे  तज्रिबा और आशिक की इजाफत में  तज्रिबये आशिक  होना चाहिये और इसका वज्‍न भी इस मिसरे में कहा तक न्‍याय करता है  बहर शिल्‍प द्वितीयक बिन्‍दु है प्राथमिक तो ख्‍याल है उसके लिये वाह

 

महफिल थी जम गयी उनके खयाल की  

था जश्न थोड़ी देर पर दिल-थाम तो हुआ वाह वाह ख्‍यालों की महफिल । हर दिले आशिक को जुबां दे दी है आपने  हालांकि उला मिसरा में बहर खारिज हो रही हे

महफिल थी जम गई जो हमारे खयाल में 

था जश्न थोड़ी देर पर आराम तो हुआ.....यूँ भी कर सकते है  और दिल थाम की जगह आराम लफ्ज पर भी विचार कीजियेगा फिर से वही बात कहेंगे शेर का भाव सुभान अल्‍लाह

 

उतरा था एक बार मुहब्बत की जंग में

नाकाम जंग होना था नाकाम तो हुआ   जंग रूत्रीलिंग शब्‍द है इस लिये रदीफ बदल जाएगा पुन: देखने का निवेदन है ।  यहाॅ तो हुआ

रदीफ का निर्वाह उला मिसरे को देखते हुए कठिन लगा हमें इस लिये सुझाव नहीं दिया

 

कहते है यार इश्क है अंजाम-बद बहुत

होना था जो अंजाम वो अंजाम तो हुआ  यहां भी सानी मिसरे का दूसरा रुक्‍न बहर से बाहर हो रहा है यहाँ भी रदीफ का निर्वाह करना हाेगा अच्‍छे बुरे को छोड़ दे अंजाम तो हुआ

 

उसको न कुछ मिला तो मुझे भी कहाँ मिला

यह बेक़सूर व्यर्थ में बदनाम तो हुआ  उला मिसरे में उसको नहीं मिला मुझे भी नहीं मिला लेकिन सानी में ये (कौन ) । सानी का अर्थ ये हो रहा है कि चलो और कुछ नहीं तो बदनाम तो हो गया ( रदीफ का तो लफ्ज विचलित कर रहा है गिरह को )

 

नाकाम जो मुहब्बत हो गयी तो क्या करें 

दीवाना कह रहा था भई काम तो हुआ . उला मिसरे के दूसरे रुक्‍न में मुहब्‍ब्‍त लफ्ज से बहर खारिज हो गई है

नाकाम हो गई है मुहब्‍ब्‍त तो होने दो

दीवाना कह रहा था चलो काम तो हुआ

 

मरहम बना तमाम वक्त बीत जो गया

जख्मे-जिगर के दर्द को आराम तो हुआ...बहुत अच्‍छी बात कही है कथ्‍य के लिये बधाई ।   उला मिसरे में (वक्‍त बीत जो ) बहर से खारिज हो रहा है  

हालां‍कि वक्‍त बीत गया

मरहम बना था वक्‍त मेरा बीत ही गया

जख्मे-जिगर के दर्द को आराम तो हुआ  

बहुत बहुत बधाई आपको इस गजल के लिये  अंत में एक बात और कहना चाहेंगे  आपको गजल कहते देख कर और आदरणीय समर साहब को गीत और छंद कहते देख कर बहुत ही प्रसन्‍नता होती है ।  ये बहर बहुत ही मधुर है और आप की गजल का कथ्‍य बहुत शानदार लगा इसलिये इस पर चर्चा करने का साहस किया कि थोडे और प्रयास से गजल को और बहतर बनाया जा सके बस इसी लिहाज से चर्चा की है । ओ बी ओ से जो कुछ सीखा है उसे यहां पोस्‍ट गजलो के माध्‍यम से वापसअपनी प्रतिक्रिया देकर अपनी समझ की भी परीक्षा कर रहे हे कि कितना सीखा है । हमारा अभ्‍यास सही दिशा में जा रहा है कि नहीं । ये विद्वतजन बताएगे । आपका स्‍न्‍ेह पूर्व वत ही बना रहेगा । सादर

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"इश्क़ तो है मगर ये इतनी भी शा'इराना नहीं कि तुझ से कहें साफ़ गोई सुनोगे क्या तुम ये अहमकाना…"
4 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"एक सप्ताह के लिए सभी चार आयोजन के द्वार खुल गए। अच्छी बात ये है कि यह एक प्रयोग है ..... लेकिन…"
yesterday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद ++++++++   ठंड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सच फ़साना नहीं कि तुझ से कहें ये बहाना नहीं कि तुझ से कहें दिल अभी जाना नहीं कि तुझ से कहें ग़म…"
yesterday
Jaihind Raipuri replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"सादर अभिवादन "
yesterday
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"सभी की नमस्कार, यूँ तो आज आयोजन प्रारंभ ही हुए हैं और किसी प्रकार की टिप्पणी करना उचित नहीं है,…"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"स्वागतम"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"स्वागतम"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"स्वागतम"
yesterday
Admin replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-184
"स्वागतम"
yesterday
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion ओ बी ओ लाइव आयोजनों से संबंधित महत्वपूर्ण चर्चा
"आपकी बात से सहमत हूँ। यह बात मंच के आरंभिक दौर में भी मैंने रखी थी। अससे सहजता रहती। लेकिन उसमें…"
Monday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .विविध

दोहा सप्तक. . . . . . विविधकभी- कभी तो कीजिए, खुद से खुद की बात ।सुलझेंगे उलझे हुए,  अंतस के हालात…See More
Monday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service