For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ (वादियों की एक दिलकश सुबह ग़ज़ल "राज")

2122   2122  212

सुन हवाओं की जवाँ सरगोशियाँ

दूधिया चादर में लिपटी वादियाँ

 

देख  भँवरे   की नजर  में शोखियाँ  

चुपके  चुपके हँस रही थीं  तितलियाँ

 

 नींद में सोये  कँवल भी जग उठे     

गुफ्तगू जब कर रही थी किश्तियाँ

 

 छटपटाती कैद में थी  चाँदनी

हुस्न को ढाँपे हुए थी बदलियाँ

 

मुट्ठियों में भींच के सिन्दूर को

मुन्तज़िर खुर्शीद की थी रश्मियाँ  

 

फिक्र-ए-शाइर पे भी छाया नूर सा

देख कातिल हुस्न की ये मस्तियाँ

 

चाहती है कौन बंधन जाल का 

मशविरा ये कर रही थी मछलियाँ

 

घोंसले  में जिन्दगी महफूज़ थी
शाख़ ने थामी हुई थी बिजलियाँ

 

हो गई कलियाँ शहाबी इश्क में

राज खोलें सब लबों की सुर्खियाँ 

---------मौलिक एवं अप्रकाशित 

Views: 959

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 2:36pm

आद० सुरेन्द्र नाथ सिंह भैय्या  ,आपका तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:40am

आद० समर भाई जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई आपका बहुत बहुत शुक्रिया .हमेशा की भांति आपक मार्ग दर्शन मिला .दरअसल गुपचुप शब्द सरगोशियाँ से संबंधित न होकर वादियों से संबंधित है ---वादियों ने गुपचुप इश्क की सरगोशियाँ सुनी .फिर भी यदि भ्रमात्मक स्थिति है तो इस मिसरे को ही बदल रही हूँ .कुछ संशोधन के साथ पुनः ग़ज़ल प्रतिस्थापित करवाती हूँ पुनः अपने नेक मशविरे  से लाभान्वित करें .

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:35am

आद० ब्रिजेश कुमार बृज जी ,आपका बहुत बहुत शुक्रिया 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 16, 2017 at 11:34am

आद० मुहम्मद आरिफ़ जी ,तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ आपको ग़ज़ल पसंद आई .

Comment by नाथ सोनांचली on January 16, 2017 at 8:18am
बहन आद0 राजेश कुमारी जी सादर अभिवादन, उम्दा गजल के लिए दाद के साथ मुबारकबाद कबूल फरमाएँ। शेष समर साहब ने बात कह ही दी है, जिससे न सिर्फ आपको, अपितु हम जैसे नये लिखने वालों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सादर
Comment by Samar kabeer on January 15, 2017 at 9:50pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले का ऊला मिसरा कमज़ोर है,'गुप् चुप'को ही सरगोशियाँ कहते हैं,आपका ये मिसरा इस तरह कहा जा सकता है:-
'सुनके देखो इश्क़ की सरगोशियाँ'
'थीं निगाहों में ग़ज़ब की शोखियां
गुफ़्तुगू जब कर रही थीं कश्तियां'
हुस्न-ए-मतला भी कमजोर है,एक तो ये कि ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है ' कर रही',इसे भी नज़र अंदाज़ कर दें तो,ऊला मिसरे में निगाहों में ग़ज़ब की शोखियों का ज़िक्र है और सानी मिसरे में 'कश्तियाँ'है, यहाँ उसूलन क़ाफ़िया ऐसा रखना होगा जिससे निगाहों का तालमेल बैठ सके,मेरा नाचीज़ मश्विरा है कि यहाँ 'किश्तियाँ'की जगह "तितलियाँ"क़ाफ़िया बहतर काम करेगा ।
तीसरे शैर के सानी में 'थी'को "थीं"कर लें ।
पांचवें शैर में "सुर्ख़रु"शब्द का आपने क्या अर्थ लिया है ?
आख़री शैर का ऊला मिसरा भी कमज़ोर है:-
'घोंसलों में जिंन्दगी महफ़ूज़ थीं'
यहाँ 'ज़िन्दगी'एक वचन है, और 'थीं'बहुवचन,देखियेगा ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 15, 2017 at 5:16pm
वाह आदरणीया सुन्दर ग़ज़ल हुई हार्दिक बधाई
Comment by Mohammed Arif on January 15, 2017 at 4:48pm
आदरणीया राजेश कुमारीजी, आदाब! अच्छी ग़ज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएँ ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
13 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service