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122 122 122 122

 

सियासत के जरिये हुआ है धमाका

जुबां बंद करिये हुआ है धमाका

 

किसे फ़िक्र है अब लहू फिर बहेगा  

कि वहशत बजरिये हुआ है धमाका

 

कहाँ शांति रहती है सरहद पे यारों

ज़रा आँख भरिये हुआ है धमाका

 

है जाना जरूरी चले जाइयेगा

तनिक तो ठहरिये हुआ है धमाका

 

बड़ी देर से आप चश्मेकफस में 

कि आहिस्ता ढरिये हुआ है धमाका

 

नहीं खून का खेल गर खेल सकते

तो बेमौत मरिये हुआ है धमाका

 

धमाकों से गर यूँ ही डरते रहेंगे

तो बेखौफ़ डरिये हुआ है धमाका

 

मिटेगी यकीनन धमाके की दहशत

अभी धीर धरिये हुआ है धमाका

 

नयी राह चलिये नजरिये बदलिये  

कि अब तो सुधरिये हुआ है धमाका

(मौलिक व अप्रकाशित)

 

 

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Comment by नाथ सोनांचली on January 16, 2017 at 8:26am
आद0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी सादर अभिवादन, उम्दा ग़ज़ल के लिए दिली मुबारकबाद, कुछ शैर तो काबिलेतारीफ हुए है।
Comment by Samar kabeer on January 15, 2017 at 10:29pm
जनाब डॉ.गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी आदाब,ग़ज़ल उम्दा हुई है,अच्छे अशआर निकाले आपने,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कुछ बातें इस ग़ज़ल के तअल्लुक़ से साझा करना चाहूंगा ।
मतले के ऊला मिसरे में,अंजाने में आपने ग़लत क़ाफ़िया ले लिया है,'ज़रिये'ये शब्द प्रचलन में आ गया है जबकि सही शब्द है "ज़रीआ" या "ज़रीऐ"।
दूसरे शैर में 'बज़रिये'शब्द भी इसी तरह है,"बज़रीए",और तक़ाबुल-ए-रदीफ़ेन का दोष भी है ,देखियेगा ।
चौथे शैर में भी तक़ाबुल-ए-रदीफ़ेन का दोष है ।
पांचवें शैर में "चश्म-ए-क़फ़स"इस तरह लिखिये ।
सातवें शैर में "बै ख़ौफ़ डरिये"की बात समझ नहीं आई,बेख़ौफ़ होके कैसे डरा जाता है ?
बाक़ी शुभ शुभ ।
Comment by Mohammed Arif on January 15, 2017 at 4:56pm
आदरणीय गोपाल नारायणजी, आदाब ! बिल्कुकुल सामयिक ग़ज़ल कही आपने । हार्दिक बधाई आपको ।

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