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इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

इक लफ्ज़ मुहब्बत का ....

लम्हों की गर्द में लिपटा
इक साया
ओस में ग़ुम होती
भीगी पगडंडी के
अनजाने मोड़ पर
खामोशियों के लबादे ओढ़े
किसी बिछुड़े साये के
इंतज़ार में
इक बुत बन गया


धुल न जाएँ
सर्दी की बारिश में
कहीं लंबी रातों के
पलकों के लिहाफ़ में
अधूरे से ख़्वाब
वो धीरे धीरे
कोहरे की लहद में
खो गया
इक लफ्ज़
मुहब्बत का
खामोश ही सो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on December 19, 2016 at 4:36pm

आदरणीय   Mahendra Kumar   जी प्रस्तुति आपकी आत्मीय प्रशंसा से उपकृत हुई   ... हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on December 19, 2016 at 4:36pm

आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी प्रस्तुति को अपने स्नेह का आशीर्वाद देने का हार्दिक आभार।

Comment by Mahendra Kumar on December 18, 2016 at 10:10am
आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत अच्छी कविता लिखी है आपने। बहुत-बहुत बधाई। सादर।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on December 18, 2016 at 7:15am
वाह्ह्ह्,सुन्दर अभिव्यक्ति आडर्निय सुशिल सरना जी
Comment by Sushil Sarna on December 16, 2016 at 12:52pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी  प्रस्तुति के भावों को स्वीकृति देती आपकी मधुर प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 15, 2016 at 10:59pm
अच्छी कविता लिखी है आपने आदरणीय । हार्दिक बधाई।
Comment by Sushil Sarna on December 15, 2016 at 8:43pm

आदरणीय समर कबीर साहिब रचना को अपने स्नेह से पल्लवित करने का हार्दिक आभार। 

Comment by Samar kabeer on December 15, 2016 at 4:48pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब, बहुत अच्छी कविता लिखी अपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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