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1222 1222 1222 1222

वफ़ा की सब फिजाओं में हमारा जिक्र आएगा ।
घिरी काली घटाओं में हमारा जिक्र आएगा ।।

पुराने खत जला देना बहुत मायूस कर देंगे ।
खतों की वेदनाओं में हमारा जिक्र आएगा ।।

खुदा से पूछ लेना तुम खुदा तस्लीम कर लेगा ।
खुदा की उन दुआओं में हमारा जिक्र आएगा ।।

बहारें जब भी आएँगी तेरी दहलीज़ पे अक्सर ।
महकती सी हवाओं में हमारा जिक्र आएगा ।।

कोई तारीफ़ में तेरे अगर कुछ शेर कह जाये ।
तो उसकी भी अदाओं में हमारा जिक्र आएगा ।।

अप्रकाशित स्वरचित

--नवीन मणि त्रिपाठी

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Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on November 22, 2016 at 10:47am
आदरणीय नवीन मणी त्रिपाठी जी रचना का भाव पक्ष बहुत ही सुन्दर है बधाई स्वीकार करें।सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 22, 2016 at 10:04am

आदरनीय नवीन भाई , गज़ल अच्छी हुई है , प्रवाहमय । हार्दिक बधाइयाँ कुबूल कीजिये । आदरणीय समर भाई की बातों का खयाल कीजियेगा ।

खुदा की उन दुआओं में हमारा जिक्र आएगा  ... को  ... खुदा से की दुआओं में हमारा जिक्र आएगा  ... किया जा सकता है

Comment by Naveen Mani Tripathi on November 16, 2016 at 6:12pm
आ0 कबीर साहब सादर नमन ।
Comment by Samar kabeer on November 16, 2016 at 4:57pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,मुब्स्र्कबाद क़ुबूल फरमाएं ।
ग़ज़ल के क़ाफिये रदीफ़ से मेल नहीं रखते,तीसरे शैर में,'ख़ुदा की उन दुआओं में हमारा ज़िक्र आएगा'भाई ख़ुदा दुआ नहीं करता ,दुआ क़ुबूल करता है,आपसे निवेदन है कि अध्यन करें ।

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