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बोलते नोट (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं भाई, ग़लती पर तुम हो, यह औरत नहीं!" दुकान में खड़े शिक्षक ने दुकानदार से कहा- "ऐसे समय में जबकि लोग राष्ट्रीय मुद्रा के पुराने अमान्य नोटों को सरकारी आदेशानुसार बैंक में जमा करने के बजाय जलाकर या फेंक कर मुद्रा का अपमान कर रहे हैं, इस औरत ने दस रुपये के इस ज़रा से फटे नोट की अपनी सुविधा व सूझबूझ से रक्षा ही की है पन्नी (पोलीथिन पाउच) में रखकर! नम्बर व ज़रूरी चीज़ें तो स्पष्ट हैं न इस नोट में! यह नोट तुम्हें स्वीकार करना चाहिए न!"

"मासाब, एक बार की बात नहीं, ये लोग तो हमेशा ही ऐसे नोट लाते हैं, ये नोट ये ही संभाल सकते हैं, हम नहीं!"

"सही कहा तुमने, न संभाल सकते हो, न ही इन लोगों को समझ सकते हो! लेकिन उनके ये नोट अगर इनकी दास्तां बयान करते हैं, तो हमारी पोल भी तो खोलते हैं!" शिक्षक ने उस औरत को दस रुपये का अच्छा नोट देकर वह पुराना कुछ फटा सा नोट लेते हुए कहा।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 21, 2016 at 5:02pm
मेरी इस लघुकथा के अवलोकन व अपनी राय देकर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरमा राजेश कुमारी साहिबा और मोहतरम जनाब विनोद खनगवाल जी।
Comment by विनोद खनगवाल on November 17, 2016 at 5:46pm

आदरणीय शेख़ शहज़ाद उस्मानी जी, एक बहुत ही भावपूर्ण लघुकथा रची है ऐसे दृश्य कई बार हमारे सामने घटते हैं किसी मजबूर को देखकर अक्सर कोई न कोई मदद के लिए आगे आ ही जाता है। 


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Comment by rajesh kumari on November 15, 2016 at 8:29pm

आज के हालत पर अच्छी लघु कथा लिखी है लोगों में संवेदना जगाती अच्छी प्रस्तुति बहुत बहुत बधाई आद० उस्मानी जी 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 15, 2016 at 5:32pm
स्नेहिल हौसला अफ़ज़ाई हेतु तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोहतरमा प्रतिभा पाण्डेय साहिबा व मोहतरम जनाब समर कबीर साहब। एक साथ कई समूहों में सहभागिता करते हुए व नेट समस्या के कारण कभी कभी जवाब प्रेषित करने में विलंब हो जाता है।
Comment by Samar kabeer on November 13, 2016 at 5:19pm
जनाब शैख़ शहज़ाद उस्मानी जी आदाब,आज के हालात पर अच्छी लघुकथा लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
आज कल आप अपनी रचना पेश करने के बाद उसकी तरफ़ पलट कर देखते भी नहीं,क्या बात है जनाब ?
Comment by pratibha pande on November 13, 2016 at 8:47am

//सही कहा तुमने, न संभाल सकते हो, न ही इन लोगों को समझ सकते हो! लेकिन उनके ये नोट अगर इनकी दास्तां बयान करते हैं, तो हमारी पोल भी तो खोलते हैं!//"  पन्नी में रखे फटे नोटों का चलन हमारे यहाँ भी बहुत है  ,अक्सर लोग सब्जी बेचने वाली महिलाओं को अपने फटे नोट दे देते हैं ..  बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना ...हार्दिक बधाई आपको आदरणीय उस्मानी जी  

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