For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"मैं जा रही हूँ घर छोड़कर, मुझे रोकना मत", फोन पर रितू को ये कहते सुनकर सलिल चौंक गया|
"क्या हुआ, मैंने तो सब कुछ भुला दिया है, तुम भी क्यूँ नहीं भूल जाती सब कुछ", उसने तुरंत पूछा|
"वही तो नहीं कर पा रही हूँ, मैं इंसान हूँ, तुम्हारी तरह देवता नहीं", बोलते बोलते वो सुबकने लगी|
"मैं आ रहा हूँ, एक बार मिलने के बाद बेशक चली जाना, मैं रोकूंगा नहीं", कहते हुए उसने फोन रख दिया और ऑफिस से निकल कर घर चल पड़ा| घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला हुआ ही था, वो अंदर कमरे में पहुँचा, रितू अपना ब्रीफकेस तैयार करके बैठी थी|
"मैंने कुछ गलत कह दिया क्या तुमसे, आजकल काम के तनाव में परेशान रहता हूँ रितू| मन से निकाल दो सब कुछ और फिर से नए सिरे से शुरू करो जिंदगी" सलिल ने उसका हाथ पकड़ लिया|
एकदम से रितू फूट फूट कर रोने लगी और उसने सलिल का हाथ झटक दिया| "तुम कुछ कहते क्यूँ नहीं मुझे, आखिर जो गलती मैंने की है, उसके लिए अगर तुमने मुझे मारा होता, एक बार धक्के मार के घर से निकाल दिया होता, तो शायद मेरा अपराधबोध कुछ कम हुआ होता| अब तुम्हारा सामना करने की हिम्मत मुझमे नहीं है, मुझे प्लीज आज़ाद कर दो", कहते हुए रितू उठी और ब्रीफकेस उठाकर चलने लगी|
"अच्छा, सिर्फ इतना बता दो, अगर ये गलती मुझसे हुई होती तो क्या तुम मुझे माफ़ नहीं करती| तुम जरूर करती रितू, तो फिर मैंने किया तो इसमें परेशानी कैसी| असली आज़ादी तो एक दूसरे को पूरा स्पेस देने में है, पूरी तरह से स्वीकार करने में है, मत जाओ प्लीज", सलिल ने उसका ब्रीफकेस लेकर रख दिया| सलिल के आगोश में रितू की हिचकियाँ कम होने लगीं, अपराधबोध आँसुओं के जरिये निकल रहा था|
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 499

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विनय कुमार on August 18, 2016 at 1:00pm

बिलकुल सही कहा आपने आ डॉ विजय शकर जी, खुद को माफ़ करने की कुव्वत सबमे नहीं होती| आभार आपका 

Comment by Dr. Vijai Shanker on August 18, 2016 at 5:17am
अपराध बोध स्वयं में बहुत ही कष्टप्रद होता है क्योंकि स्वयं को कोई क्षमा नहीं कर पाता है।
आदरणीय विनय कुमार सिंह जी , बधाई , इस प्रस्तुति पर , सादर।
Comment by विनय कुमार on August 17, 2016 at 8:55pm

बहुत बहुत आभार आ डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी, शुक्रिया आपके सुझाव के लिए| इसी तरह मार्गदर्शन करते रहिये

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 17, 2016 at 8:14pm

आ० विनय जी आपकी कलम से हे ऐसी व्यवस्थित कथा निकल सकती है .अपराधबोध आँसुओं के जरिये निकल रहा था| --लघु कथा के लिहाज से यह पंक्ति अनावश्यक जान पड़ती है सादर ,

Comment by विनय कुमार on August 17, 2016 at 5:46pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ कल्पना भट्ट जी

Comment by विनय कुमार on August 17, 2016 at 5:46pm

बहुत बहुत शुक्रिया आ समर कबीर साहब  

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 17, 2016 at 5:33pm
अपराधबोध में पश्चाताप होना । पति पत्नी की आपसी समझ बहुत जरुरी है बहुत सार्थक सन्देश देती हुई इस कथा के लिए बधाई स्वीकारें आदरणीय ।
Comment by Samar kabeer on August 17, 2016 at 3:05pm
जनाब विनय कुमार सिंह जी आदाब,बहुत बढ़िया लघुकथा लिखी,बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
7 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
17 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
21 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
yesterday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service