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वर्षा की बूंदों में कहीं
उमड़ते घुमड़ते बादल है
हरयाली है हर तरफ
प्रेम प्रीत की बौछार है
सावन के हैं गीत कहीं
कहीं त्योहारों की माला है
मौसम है यह सुहाना
हर मन को यह भाता है ।

गिली मिटटी पर फसल होती
देश के लोगों की भूख है मिटती
किसान की खुशहाली से
धरा भी खुश खुश है रहती ।
सुखी प्यासी धरा बनती दुल्हन
हाथों पर महेंदी है रचती ।

कहीं कटे है पेड़ सभी
कहीं नहर को रोका है
पानी भी अपने राह पर चलता
कभी हंसाता ,कभी रुलाता
बाढ़ बन सबको डराता
बह जाते हैं लोग बहुत
मकान सारे कभी ढह जाते हैं ।

वर्षा का है अपना अलग मिज़ाज़
प्यार कहीं तो कहीं हाहाकार है ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

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Comment by Ashok Kumar Raktale on August 4, 2016 at 7:48am

वाह ! सुंदर अभिव्यक्ति आदरणीया कल्पना भट्ट जी.सादर.

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 2, 2016 at 10:29pm
जी आदरणीय सर । इस गलती के लिए पुनः क्षमा । सादर ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 2, 2016 at 7:32pm

आपके रचना-व्यवहार केलिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीया. प्रस्तुत करने के पूर्व अपनी रचना को एक बार सचेत नज़रों से दुहरा लिया करें.

और आगे क्या कहूँ ?

सादर

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on August 2, 2016 at 11:43am
आदरणीया कल्पना भट्ट जी मौके की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई ।
Comment by Samar kabeer on August 2, 2016 at 10:46am
मोहतरमा कल्पना भट्ट साहिबा आदाब,वर्षा की रिमझिम में इस सुंदर प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करे ।
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 2, 2016 at 9:54am
सर आप सही है । गलतियों के लिए क्षमा चाहूंगी । सादर ।
Comment by Sushil Sarna on August 1, 2016 at 8:57pm

आदरणीय कल्पना जी वर्षा के माध्यम से आपने सुंदर भावों का चित्रण किया है। आ. क्षमा सहित शीर्षक 'वर' समझ नहीं आया। इसके अतिरिक्त शाब्दिक दोष जैसे भूक= भूख ,खुश हाली=खुशहाली ,माकन=मकान ,डेह=ढह आदि के कारण रचना के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। कृपया मेरे कहे को अन्यथा न लेवें। हो सकता है मैं भी गलत होऊं। हम सब इस मंच पर विद्यार्थी हैं। भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई। 

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