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कोई कल्पना-स्वप्न ही होगा शायद

हुआ जो हुआ, वह इरादतन नहीं था

नियति की काल-कोठरी को बूझा है कौन

‘ कहाँ- कहाँ था मेरा दोष ’ का गंभीर भान

दोष कहीं कोई तुम्हारा नहीं था

जीवन के आरोह-अवरोह से डरी-डरी

अज्ञात भय से भीगी तुम कह देती थी ...

अनहोनी का होना कोई नया नहीं है

और मैं, गई रात की हिमीभूत टीस छिपाये

हलके-से दबाकर हाथ तुम्हारा

मुस्करा देता था

उस गंभीर पल को छल देता था

अनगिन अग्नि-परीक्षाओं से गुज़रे

अनुभव-वृद्धा रिश्ते के अनबूझे क्षण

हृदय में भय आशंकाहत

समय की अदृश्य लहरें उच्छृंखल

भयंकर जलावर्त

प्रतिदिन नव-आविष्कृत गहरे अरूप

अविश्वास में उलझे भावों का भार नवीन

एक और कल तक रूक न सकती थीं हमारी

आसमान से मिली हुई वह भाव-विभोर बातें

अब अनुदित अपरीसीम दूरियाँ

असाधारण सतही सामंजस्य अनेक

शब्दाभिव्यक्ति की खोज में 

टूटी-बिखरी उन बातों का सारा

पड़ा है बंजर प्रसार

आज हाथ तुम्हारा जब पास नहीं है

मैं बैठा दुहरा देता हूँ तुम्हारे पूर्वाभास को

‘ अनहोनी का होना कोई नया नहीं है ’...

गहराई के कमरे में गुज़रे पलों की यादें पसार

मन ही मन नियति के नियमों को टटोलती

बादलों की गरजन में दिल की धड़कन को गिनती

प्रिय, मेरी आहट को न सुन, तुम उदास न रहा करो

                         

                        ---------

-विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Vijai Shanker on June 22, 2016 at 6:28pm
सुन्दर , गम्भीर, खुद को एक स्वप्न में ले जाती इस सार गर्भित रचना के लिए बधाई , आदरणीय , विजय निकोर जी ,सादर।
Comment by Sushil Sarna on June 22, 2016 at 1:30pm

आज हाथ तुम्हारा जब पास नहीं है
मैं बैठा दुहरा देता हूँ तुम्हारे पूर्वाभास को
वाह अप्रतिम प्रस्तुति .... अंतर्मन की गहनता को बहुत ही सुंदर ढंग से अापने कागज़ प र उकेरा है ... हार्दिक बधाई अादरणीय विजय निकोर साहिब।

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