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शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर (ग़ज़ल)

2122 1212 22

आसमाँ हम भी छू ही लेते,मगर
काट डाले गए हमारे पर

हमको काँटों की राह प्यारी है
आप ही कीजे रास्तों पे सफ़र

अपनी आँखों में जुगनू बसते हैं
हम पे होगा न तीरगी का असर

हम तो रहते हैं आप के दिल में
खुद का अपना नहीं है कोई घर

इस क़दर खो गया है होश-ओ-हवास
आजकल है न हमको अपनी ख़बर

मर्ज़ पहुँचा है उस मुक़ाम पे अब
हो गया खुद बिमार चाराग़र

नक़्श उसका बसा लिया दिल में
कौन मंदिर को जाए शाम-ओ-सहर

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना,
शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर
=========================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 782

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on June 7, 2016 at 11:33am
वाह, शे'अर-दर-शे'अर दाद-ओ-मुबारकबाद कुबूल फ़रमाइयेगा मोहतरम जनाब जयनित कुमार मेहता जी।
Comment by Sushil Sarna on June 7, 2016 at 11:22am

नक़्श उसका बसा लिया दिल में
कौन मंदिर को जाए शाम-ओ-सहर

इतना आसाँ नहीं ग़ज़ल कहना,
शाइरी माँगती है ख़ून-ए-जिगर

बहुत खूब आदरणीय जयनित जी खूबसूरत अहसासों की इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

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