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ग़ज़ल -- पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--2122--212

पाँव के नीचे से धरती सर से छप्पर ले गया
ज़लज़ला कुछ बेबसों के सारे गौहर ले गया

ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है
शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया

हौसला, हिम्मत, ज़वानी, ख़्वाहिशें, बे-फिक्र दिल
वक़्त का दरिया मेरा सब कुछ बहा कर ले गया

सारी दुनिया जीत कर भी हाथ खाली ही रहे
वक़्त-ए-रुख़सत इस जहाँ से क्या सिकन्दर ले गया

छु न पाये हाथ उसके जब मेरी दस्तार को
तैश में आकर वो काँधे से मेरा सर ले गया

जब हुआ ससुराल में नव-ब्याहता का दिल उदास
इक हवा का झोंका उसको पल में पीहर ले गया

मुझको महफ़िल में दिखानी थी तख़य्युल की उड़ान
मैं बिना पर के परिन्दों को फ़लक़ पर ले गया

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by बशर भारतीय on May 24, 2016 at 2:51pm
आ. दिनेश कुमारजी बेमिसाल ग़ज़ल है हर शे'र लाजवाब है बधाई आपको
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 24, 2016 at 2:33pm

वाह वाह ..बहुत खूब ..सभी शेर उम्दा हैं..बहुत बहुत बधाई 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 23, 2016 at 10:26pm
बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल हुई आदरणीय
Comment by जयनित कुमार मेहता on May 23, 2016 at 10:15pm
आदरणीय दिनेश जी, बहुत खूब ग़ज़ल कही आपने।


"जब हुआ ससुराल में नव-ब्याहता का दिल उदास
इक हवा का झोंका उसको पल में पीहर ले गया"

वाह जनाब,वाह!!
Comment by kanta roy on May 23, 2016 at 4:44pm
मुझको महफ़िल में दिखानी थी तख़य्युल की उड़ान
मैं बिना पर के परिन्दों को फ़लक़ पर ले गया------- वाह ! वाह ! क्या खूब कही है आपने ! लाजवाब हो गये ! बधाई आपको आदरणीय दिनेश जी ।
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on May 22, 2016 at 5:53pm

वाह वाह .........दिनेश साहेब....जिंदाबाद  

Comment by vandana on May 21, 2016 at 8:34pm

कमाल का मतला आदरणीय दिनेश जी कमाल ग़ज़ल बहुत ही बढ़िया 


ज़िन्दगी के खुशनुमा लम्हों से वो महरूम है
शाम को जो साथ अपने घर में दफ़्तर ले गया ........ पिछले दिनों अच्छी तरह वास्ता पड़ा है इस अनुभव से 

Comment by दिनेश कुमार on May 21, 2016 at 7:52pm
शुक्रिया आदरणीया आभा जी। इनायत है आपकी।
Comment by दिनेश कुमार on May 21, 2016 at 7:51pm
शुक्रिया आ मिश्रा जी।
Comment by दिनेश कुमार on May 21, 2016 at 7:50pm
बहुत बहुत शुक्रिया आ. अनुज साहिब। इनायत है सर आपकी।

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