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जोंक (लघुकथा )राहिला

"हजूर,मांई बाप! कुछ रूपया मिल जाता तो बड़ी मेहरबानी हो जाती।"
"कितने चाहिये?"आवाज में दबंगी की खनक थी ।
"यात्रा लाक(लायक)हजूर!बस दो हजार।"
"अच्छा...चैत काटने जा रहे हो।"
"हओ मालिक! "
"हूँsss..कोई गारंटी या कुछ गिरवी रखने लाये हो?"जोंक को जैसे शिकार मिला ।
"काहे मजाक करते हो सरकार!हम गरीबों के पास क्या धरा?"
"देखो भई!मैं लेनदेन का काम कच्चा करता ही नहीं ।बिना कुछ गिरवी रखे एक दमड़ी नहीं दूंगा।"शब्दों को चबाते हुये वे कुछ रूके,फिर पुनः बोले-वैसे...,एक चींज है तुम्हारे पास.., अगर तुम चाहो तो...,फिर जब चाहे तब पैसा दे देना कोई जल्दी नहीं, और ना के बराबर ब्याज लूंगा।मंजूर हो तो बोलूं!"
उनकी बात सुन हैरान, परेशान सा मजदूर किसान असमंजस में पड़ गया और ख्यालों के घोड़े जवान बेटे से जवान बेटी तक दौड़ गये।हलक सूखा सा मालूम हुआ। उसे सोच में डूबा देख, वो उसकी मनोस्थिति भांप गये।
"अरे इतना भी क्या सोच रहे हो?पूर्वजों के जमाने लद गये । अब तो कागजों का लेनदेन भर रह गया है।ये रहे तुम्हारे दो हजार रूपये । वे मेज पर टांगे और रूपये रख कर इत्मेनान से बोले।"
"रामदई मालिक! मेरे पास गिरवी रखने लाक कैसेई कागज नहीं है।"वो हाथ जोड़ कर बोला।
"है ना..! वो तेरा बी.पी.एल.कार्ड।"
बी.पी. एल.कार्ड(गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को मिलने वाला राशन कार्ड, जिसके अंतर्गत काफी किफायती दामों पर गेहूं, चावल, शक्कर और मिट्टी का तेल आदि मिलता है)
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Rahila on March 23, 2016 at 11:02am
आद.सुशील सर जी! आपको रचना पसंद आई मेरा लेखन सार्थक हुआ। बहुत -बहुत आभार समय निकालकर रचना की समीक्षा करने के लिये सादर।
Comment by Parvez khan on March 23, 2016 at 10:45am
आद राहिला जी आपने एक ऐसा सच सामने जिससे सबसे ज्यादा सहरिया आदिवासी वर्ग पीडित है बो लोग अधिकतर अपने कार्ड गिरबी रखते है ऐर बहुत कम रूपयो के लिये साहूकार उनकी गरीबी का अच्छे से फायदा उठाते है ।हमारे जनप्रतिनिधि ओर शासन के कर्मचारी भी उन्हे बी पी एल कार्ड के लाभ नही समझाते ।
Comment by Sushil Sarna on March 22, 2016 at 4:30pm

आ. राहिला जी यथार्थ को उजागर करती और गरीबी,बेबसी मजबूरी को जीवंत करती इस लघु कथा की प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई। 

Comment by Rahila on March 22, 2016 at 4:24pm
आद. चंद्रेश सर जी! बड़ी हैरानी हुई थी मुझे ये बात जानकर । और बहुत अफसोस भी, उस पर आप ने इसी तरह के और प्रमाण दिये तो लगा कुछ बचा है सौदे के लिये?आपने रचना को पसंद किया बहुत शुक्रिया । सादर नमन
Comment by Rahila on March 22, 2016 at 4:18pm
बहुत आभार आदरणीय तेजवीर सर जी !आप मेरा हर बार हौसला बढ़ाते है जिसके लिये मैं तहेदिल से शुक्र गुजार हूं। सादर प्रणाम ।
Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 21, 2016 at 4:56pm

बीपीएल कार्ड और इस तरह की कई चीज़ों का सौदा होता है| दवाई की दुकान वाले किसी और का लाइसेंस ले लेते हैं, यहाँ राजस्थान में भामाशाह कार्ड भी बन रहा है, जिन्हें मेडिकल बिलों का पुनर्भुगतान होता है वो अपने रिश्तेदारों की दवाईयाँ भी स्वयं के कार्ड से खरीद लेते हैं, किसी  का पेंशन कार्ड कोई दूसरा दिखा कर फायदा ले रहा है| यह मुद्दा और इससे जुड़े मुद्दे ज्वलंत हैं और समाज में विचारणीय हैं| आपको बहुत बधाई इस रचना को पढने के बाद कई पाठक सोचने को विवश हो जायेंगे|

Comment by TEJ VEER SINGH on March 21, 2016 at 1:46pm

हार्दिक बधाई आदरणीय राहिला जी!बहुत दूर की कौडी ढूंढ के निकाली है!बेहतरीन प्रस्तुति!

Comment by Rahila on March 21, 2016 at 1:15pm
आदरणीय सुनील जी!चार दिन पहले ही ये बात मेरे संज्ञान में आई और मेरी हैरानी की सीमा नहीं थी । तब इस मुद्दे को उठाना जरूरी समझा।दबंगी की हद है।एक-एक व्यक्ति के पास तीन-तीन कार्ड तक है जिससे दस गुना से ज्यादा मुनाफा कमा रहे है। आपकी त्वरित प्रतिक्रिया के लिये बहुत आभार । सादर ।

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