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ग़ज़ल - हवादिस पूछने आते हैं अब मेरा पता मुझसे ( गिरिराज भंडारी )

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न जाने बे खयाली में हुआ है क्या बुरा मुझसे

हवादिस पूछने आते हैं अब मेरा पता मुझसे

 

मुहब्बत हो कि नफरत हो , झिझक कैसी है कहते अब  

हया कैसी है डर कैसा , बयाँ कर दे, जता मुझसे

 

अगर इनआम देना है , कहीं से भी शुरू कर तू

सजा का वक़्त गर आये तो फिर कर इब्तिदा मुझसे

 

न कह मुझसे जलाऊँ मै चरागों को कहाँ, कैसे

जलाऊँगा , अभी ठहरो , मुख़ालिफ़ है हवा मुझसे

 

समझ पाते तो अच्छा था वो मेरी बे ज़ुबानी भी

कहो उनसे न पूछें वो कभी भी मुद्दआ मुझसे

 

मै सच का आइना लेके हुआ जब भी मुकाबिल तो

कभी सूरज कभी चंदा हुआ मद्धम , छिपा मुझसे

 

तू जज़्बाती न होता तो भला बाहर मै आता क्यों

कभी बहते हुये आँसू ने रुक कर था कहा मुझसे

 

शिकायत क्या करूँ ग़ैरों से , बुझता एक दीपक हूँ

नहीं रखते हैं अपने भी कोई भी वास्ता मुझसे

 

तू चाहे अनसुनी करके गया हो मेरा अफ़साना

मै सुन लूँगा तेरी हर बात अगर चाहे बता मुझसे  

*********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित ।

Views: 441

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Comment by Ravi Shukla on March 17, 2016 at 3:13pm

अगर इनआम देना है , कहीं से भी शुरू कर तू

सजा का वक़्त गर आये तो फिर कर इब्तिदा मुझसे

वाह वाह आदरणीय गिरिराज जी बहुत बहुत बधाई इस ग़ज़ल के लिये । सादर

Comment by Samar kabeer on March 16, 2016 at 6:32pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,वाह बहुत ख़ूब क्या कहने,इस शानदार ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।

चोथे शैर में तक़ाबुल-ए-रदीफ़ का दोष है, देखिएगा ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on March 16, 2016 at 12:47pm
सुन्दर ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 16, 2016 at 10:52am

आ० भाई गिरिराज जी इस सुन्दर ग़ज़ल के लिए कोटि कोटि बधाई l

Comment by narendrasinh chauhan on March 15, 2016 at 1:47pm

बेहेतरीन ग़ज़ल, लाजवाब शेर

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