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सोच असुरों सी करो मत दोस्तो - ग़ज़ल

2122    2122    212
**********************  
कब   यहाँ   पर्दा  उठाया  जाएगा
कब  हमें  सूरज दिखाया  जाएगा /1

थक गए हैं झूठ  की उँगली पकड़
सच का दामन कब थमाया जाएगा /2

सब   परेशाँ   तीरगी   से   दोस्तो
कब  दिया  कोई  जलाया जाएगा /3

है  सुरक्षा  खाद्य  की   कानून में
पर अनाजों  को  सड़ाया  जाएगा /4

दूर महलों से खड़ी कुटिया में फिर
इक  निवाला  बाँट  खाया जाएगा /5

यह समय है झूठ का कहते है सब
राम  को  रावण  बताया  जाएगा /6

सोच असुरों  सी करो  मत दोस्तो
खून  से  खुद के नहाया  जाएगा /7

***********************
मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

Views: 720

Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:02am

आ0 भाई राहुल जी , गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:02am

आ0 भाई आशुतोष जी गजल पर उपस्थित हो स्नेह जताने के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:01am

आ0 भाई रामबली जी, उपस्थिति से गजल का मान बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Rahul Dangi Panchal on March 12, 2016 at 1:32pm
बहुत ही सुन्दर आदरणीय
Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 11, 2016 at 9:51am

आदरणीय लक्ष्मण भाई जी ..वर्तमान परिदृश्य का बखूबी चित्रण करती इस शानदार ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by रामबली गुप्ता on March 10, 2016 at 9:03pm
क्या बात कही आ.लक्षमण धामी जी
बेहतरीन गज़ल के लिए हार्दिक बधाई आपको
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:01am

आ० भाई सूबेसिंह जी प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 11:00am

आ० भाई समर कबीर  जी अपनी उपस्थिति से ग़ज़ल का मन बढ़ने के लिए हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 10:59am

आ० भाई राम शिरोमणि  जी उत्साहवर्धन के लिए आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 10, 2016 at 10:58am

आ० भाई नरेंद्र  जी. प्रशंसा के लिए आभार l

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