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महज इक हार से जीवन नहीं बुनियाद खो देता -ग़ज़ल

1222    1222    1222    1222
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न कोई दिन बुरा गुजरे  न कोई रात भारी हो
जुबाँ को  खोलना  ऐसे न कोई बात भारी हो /1

दिखा सुंदर तो करता है हमारा गाँव भी लेकिन
बहुत कच्ची हैं दीवारें  न अब बरसात भारी हो /2

न तो धर्मों का हमला हो  न ही पंथों से हो खतरा
न इस जम्हूरियत पर अब किसी की जात भारी हो /3

पढ़ा विज्ञान  है  सबने  करो  तरकीब  कुछ ऐसी
न तो  हो तेरह का खतरा न साढ़े  सात भारी हो /4

महज इक हार से जीवन नहीं बुनियाद खो देता
हमारे  हौसले   पर  फिर  न कोई मात भारी हो /5

समझ लेना चमन  में फिर  उठेगा  जलजला कोई
‘मुसाफिर’ पेड़ पर जब भी महज इक पात भारी हो /6


मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:02pm

आ० भाई मनोज जी हार्दिक आभार l

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:01pm

आ0 भाई धर्मेन्द्र कुमार जी, उत्साहर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:01pm

आ0 भाई गिरिराज जी , आपकी उपस्थिति और सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साहदूना हुआ । इस स्नेह के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:01pm

आ0 भाई रवि शुक्ला जी, गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार। स्नेह बनाए रखें।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:01pm

आ0 भाई नादिर खान जी आपकी विस्तृत और सकारात्मक प्रतिक्रिखा से अत्यधिक उत्साहवर्धन हुआ । हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:00pm

आ0 भाई समर कबीर जी गजल पर उपस्थिति और अनुमोदन के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by मनोज अहसास on March 2, 2016 at 3:57pm
बहुत बहुत बहुत बधाई
सादर
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 2, 2016 at 10:25am

अच्छे अश’आर हुए हैं आदरणीय लक्ष्मण जी, दाद कुबूल करें।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2016 at 8:43pm

महज इक हार से जीवन नहीं बुनियाद खो देता
हमारे  हौसले   पर  फिर  न कोई मात भारी हो -- बेहतरीन बात कही ! बहुत सुन्दर गज़ल कही है , गज़ल के लिये आपको हार्दिक बधाई ।

Comment by Ravi Shukla on March 1, 2016 at 6:02pm

आदरणीय लक्ष्‍मण जी बढिया अशआर हुए है शेर दर शेर बधाई कुबूल करें

न तो धर्मों का हमला हो  न ही पंथों से हो खतरा
न इस जम्हूरियत पर अब किसी की जात भारी हो ......आमीन

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