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१२२२/१२२२/१२२२/१२२२
.
कभी बदनाम गलियों में भटकती हैं तमन्नाएँ,
कभी खुद की निगाहों में खटकती हैं तमन्नाएँ.
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हवस की मकड़ियाँ बुनती है दिल में जाल हसरत के,
जहाँ मौका मिला, आकर, अटकती है तमन्नाएँ.
.
तमन्नाओं का अंधड़ रोक पाना है बहुत मुश्किल,
मगर दिल में बसा हो रब, ठिठकती हैं तमन्नाएँ.
.
कोई इंसान जब अपनी ख़ुदी को जीत लेता है,
तो फिर क़दमों में उस के, सर पटकती हैं तमन्नाएँ.
.
सफ़र जब जिस्म से बाहर का करने रूह चलती है,
चिता की लकड़ियाँ बन कर चटकती हैं तमन्नाएँ.
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित

Views: 711

Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on January 29, 2016 at 2:56pm
बहुत ख़ूब।
Comment by Samar kabeer on January 29, 2016 at 2:51pm
जनाब निलेश'नूर'जी आदाब,शानदार ग़ज़ल,बधाई आपको !
Comment by TEJ VEER SINGH on January 29, 2016 at 1:34pm

हार्दिक बधाई आदरणीया नीलेश  जी!बहुत खूबसूरत गज़ल!आखिरी शेर तो गज़ब ढा रहा है !

सफ़र जब जिस्म से बाहर का करने रूह चलती है,
चिता की लकड़ियाँ बन कर चटकती हैं तमन्नाएँ.!

पुनः बधाई!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 29, 2016 at 12:44pm
तमन्नाओं के सच को समक्ष करते बहुत शानदार अशआर कहे हैं आ0 नीलेश जी, बहुत बहुत बधाई
Comment by Ravi Shukla on January 29, 2016 at 10:40am

वाह वाह निलेश नूर जी बहुत बढि़या गजल कही है आपने तमन्‍नओं को बहुत ही अच्‍छे तरीके से बयान कर दिया शेर दर शेर मुबारक बाद कुबूल करें ।

Comment by दिनेश कुमार on January 28, 2016 at 9:27pm
बेहतरीन ग़ज़ल आ.निलेश भाई। आखिरी दो शेर बहुत ज़बरदस्त। मुबारकबाद।

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