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ग़ज़ल 
गा गा लगा लगा/ लल/ गा गा लगा लगा
.

झीलों में ऐसे..... चाँद डिबोता हूँ आज भी,
आँखों में रख के आप को रोता हूँ आज भी.  
.
अब तक दरख्त जितने उगाए, बबूल हैं,
दिल में मगर मैं यादों को बोता हूँ आज भी.
.
आदत में था शुमार तेरे साथ जागना,
तेरे बगैर देर से सोता हूँ आज भी.
.
नमकीन पानियों से जो रंगत निखरती है,
रुख़सार आँसुओं से मैं धोता हूँ आज भी.
.
काँधे पे इक सलीब उठाए फिरा करूँ,
नाकामियों का बोझ मैं ढ़ोता हूँ आज भी.
.

उसका पता मुझे जो मिला वो ग़लत मिला,  
ख़ुद को तलाश-ए-यार में खोता हूँ आज भी.
.
जुगनू नहीं, चिराग़ नहीं शम्स भी नहीं,   
लेकिन तेरे ही “नूर” सा होता हूँ आज भी.   
.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 715

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 12, 2016 at 3:38pm

शुक्रिया आ. सौरभ सर 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 11, 2016 at 11:41pm

इस बहुत ही अच्छी ग़ज़ल के लिए हृदयतल से दाद कह रहा हूँ, आदरणीय नीलेशजी. 

मिसरों का वज़न - २२१ २१२१ १२२१ २१२ या  गागालगा गालगाल लगागाल गालगा  की रह लिखें.  

शुभेच्छाएँ 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 11, 2016 at 6:16pm

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Ravi Shukla on February 11, 2016 at 3:36pm

आदरणीय निलेश जी बहुत अच्‍छी ग़ज़ल कही है आपने शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं .

Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 10, 2016 at 9:01am

शुक्रिया आ. जयनीत भाई

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2016 at 8:59pm
शानदार ग़ज़ल कही आपने,
आदरणीय निलेश जी।।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 9, 2016 at 8:45am

शुक्रिया आ. मिथिलेश जी ..

Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 9, 2016 at 8:44am

शुक्रिया आ. शिज्जू भाई 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 9, 2016 at 8:44am

शुक्रिया आ. समर साहब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on February 9, 2016 at 8:43am

शुक्रिया आ. सुशिल जी 

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