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ग़ज़ल -- ज़िन्दगी मैंने गुज़ारी ख़्वाब में। ( दिनेश कुमार )

2122--2122--212

हौसले जिनके बहे सैलाब में
उम्रभर फिर वे रहे गिर्दाब में

हो मुबारक चापलूसी आपको
अपनी दिलचस्पी नहीं अलक़ाब में

ढो रहें हैं बोझ हम तहज़ीब का
गर्मजोशी अब कहाँ आदाब में

कुछ अधूरे ख़्वाब, आहें और अश्क
बस यही है अब मेरे असबाब में

कौन करता रौशनी की कद्र अब
ढूँढ़ते हैं दाग़ सब महताब में

गीत ग़ज़लें छन्द मुक्तक हम्द नात
क्या नहीं है शायरी के बाब में

इसकी ख़ुशहाली का कारण ये भी है
पांच नदियाँ हैं मेरे पंजाब में

सिर्फ़ इतना सा है अफ़साना 'दिनेश'
ज़िन्दगी मैंने गुज़ारी ख़्वाब में

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by दिनेश कुमार on March 9, 2016 at 6:31am
आप सभी आदरणीय साथियों का हादिक आभार।
Comment by Rahul Dangi Panchal on February 28, 2016 at 7:08am
वाह वाह आदरणीय दिनेश भाई जी
Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 31, 2016 at 8:49am

वाह भाई वाह..खूब 

Comment by Ravi Shukla on January 29, 2016 at 11:50am

आदरणीय  दिनेश भाई जी,बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने ,हर शेर बहुत ही बढि़या हुआ है दिली दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 28, 2016 at 1:24am

आदरणीय  दिनेश भाई जी,बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने , शेर दर शेर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 21, 2016 at 11:04pm
वाह दिनेश भाई क्या ग़ज़ल कही है दिली दाद हाज़िर है क़ुबूल फ़रमायें
Comment by TEJ VEER SINGH on January 21, 2016 at 2:53pm

हार्दिक बधाई दिनेश जी!शानदार गज़ल!

ढो रहें हैं बोझ हम तहज़ीब का
गर्मजोशी अब कहाँ आदाब में

Comment by Samar kabeer on January 21, 2016 at 2:48pm
जनाब दिनेश कुमार जी आदाब,बहुत ही शानदार ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं |

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