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किसे कहें विदा और करें किसका स्वागत जतन।

200

वही रवि, वही किरण, 

वही धरा, वही गगन,

शीत के पुनीत कर्म में जुड़ा वही पवन।

 

वही रजनी, वही दिवा, 

वही संध्या , वही उषा,

मयंक भी भटक रहा लिये सतत जिजीविषा।

 

पुरा वही, वही नया , 

कहें सभी नया, नया,

बदल रहे हैं मात्र अंक, बदल रही सतत प्रभा।

 

इसी गणन में अटका मन 

निहारता रूपान्तरण,

किसे कहें विदा और करें किसका स्वागत जतन।

 

मौलिक  एवं अप्रकाशित 

०१ जनवरी २०१६

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Comment by Dr T R Sukul on January 4, 2016 at 6:03pm

आदरणीय कबीर साहब ! रचना की प्रशंसा करने के लिए कोटिशः धन्यवाद। 

Comment by Dr T R Sukul on January 4, 2016 at 6:03pm

आदरणीय शेख साहब ! रचना को पसंद करने और उसपर अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए विनम्र आभार।

Comment by Dr T R Sukul on January 4, 2016 at 6:03pm

रचना की सराहना के लिए अपार धन्यवाद आदरणीय दुबे जी !

Comment by Samar kabeer on January 2, 2016 at 3:23pm
जनाब डा.टी.आर.सुकुल जी आदाब,बहुत अच्छा लिखते हैं आप,इस प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकार करें |
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 2, 2016 at 9:17am
कड़वी सच्चाई लिए यथार्थ का बढ़िया चित्रण हुआ है बेहतरीन रचना में, नकारात्मक पक्ष पुनः चिंतन करने को प्रेरित करता है इस दुविधा वाली परिस्थिति से बाहर आने के लिए । तहे दिल बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय त्रैलोक्य रंजन शुक्ल जी ।
Comment by Hari Prakash Dubey on January 1, 2016 at 8:17pm

सुंदर रचना बधाई आ.  Dr T R Sukul जी !

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