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ग़ज़ल इस्लाह के लिए (मनोज कुमार अहसास)

2212 2212 2212 12


सज़दो का मेरा इश्क़ के ईनाम लिख दिया
साकी ने मेरे आंसुओं को जाम लिख दिया

सारे जहां की दौलते मुठ्ठी में आ गयीं
बेटी ने मेरे हाथ पर जब नाम लिख दिया

खुद को मिला के आ गया दुनिया की भीड़ में
उसने उदासियां का मेरी दाम लिख दिया

इस ज़िन्दगी के घाव कितने कम लगे मुझे
मैंने तड़फती सोच मे जब राम लिख दिया

हाथों के ज़ख्मो पेट की सिलवट को देखकर
घबरा के चारागर ने भी आराम लिख दिय

लपटों मे घिर न जाये कहीं ठुकराया फूल वो
उसको कबीरा वल्दियत इक राम लिख दिया

मेरी दुआ के बदले मे भेजा है शुक्रिया
बिगड़े मेरे नसीबो का इल्ज़ाम लिख दिया

'अहसास' तेरे ज़िक्र को कर पाया यूँ जमा
आखिर मे तेरे नाम ही पैगाम लिख दिया


मौलिक और अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 11, 2015 at 11:05am

आदरणीय मनोज भाई , गज़ल बहुत सुन्दर कही है , दिली बधाइयाँ आपको ।

नीचे के दो मिसरे की तक्तीअ एक बार और कर लीजियेगा --

लपटों मे घिर न जाये कहीं ठुकराया फूल वो

बिगड़े मेरे नसीबो का इल्ज़ाम लिख दिया

Comment by मनोज अहसास on September 10, 2015 at 7:32pm
बहुत आभार शकूर साहब
मुझे बहर के बारें में ज्यादा जानकारी नहीं है
छोटे छोटे कदमो से सीख रहा हूँ
आपसे मार्गदर्शन की चाह है
कृपिया स्पष्ठ रूप से निर्देश देने की कृपा करें
बहुत शुक्रिया
सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 10, 2015 at 7:21pm
अहसासजी कोशिश अच्छी है बधाई स्वीकार करें। बस मैं इस बह्र को लेकर संशय में हूँ, इस बह्र में जिहाफ़ कैसे लगेगा? ये मेरी गलती भी हो सकती है।
Comment by मनोज अहसास on September 10, 2015 at 3:30pm
आप सभी का बहुत बहुत आभार
तहेदिल से शुक्रिया
बहुमूल्य इस्लाह का शुक्रिया

थोड़ी जल्दबाज़ी ज़रूर हुई है
गलतिया सुधारने का प्रयास करता हूँ
सादर
Comment by Sushil Sarna on September 9, 2015 at 8:09pm

सज़दो का मेरा इश्क़ के ईनाम लिख दिया

साकी ने मेरे आंसुओं को जाम लिख दिया

सारे जहां की दौलते मुठ्ठी में आ गयीं

बेटी ने मेरे हाथ पर जब नाम लिख दिया
वाह वाह और वाह आदरणीय जी … बहुत ही सुंदर और दिलकश भावों की इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई।

Comment by Ravi Shukla on September 9, 2015 at 5:42pm

आदरणीय मनोज जी । वाह वाह क्‍या बात है बड़ी सुन्‍दर ग़ज़ल कही है आपने

सारे जहां की दौलते मुठ्ठी में आ गयीं
बेटी ने मेरे हाथ पर जब नाम लिख दिया

इस शेर ने तो दिल बाग बाग कर दिया जनाब दिली दाद कुबूल करें

मतलअ में सजदों को बहुवचन कर रहे है तो, सजदो को मेरे इश्‍क का ईनाम लिख दिया भी कह सकते है । प्रवाह और निखर सकता है ।

शेर दर शेर बधाईयां कुबूल करें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 9, 2015 at 5:36pm

आदरणीय मनोज भाई जी, इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.....लगता है ग़ज़ल जल्दबाज़ी में पोस्ट हुई है. एक बार इन मिसरों को अवश्य देख लीजियेगा -

सज़दो का मेरा इश्क़ के ईनाम लिख दिया

उसने उदासियां का मेरी दाम लिख दिया

घबरा के चारागर ने भी आराम लिख दिय

लपटों मे घिर न जाये कहीं ठुकराया फूल वो

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