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गुलाबी जिल्द वाली डायरी [कविता ]

वो थी एक डायरी

गुलाबी जिल्द वाली

अन्दर के चिकने पन्ने

खुशनुमा छुअन लिए

मुकम्मल थी एकदम

कुछ खूबसूरत सा

लिखने के लिए I

 

सिल्क की साड़ियों की

तहों के बीच,

अल्मारी में सहेजा था उसे   

उन मेहंदी लगे हाथों ने,  

सेंट की खुशबू

और ज़री की चुभन

 को   करती रही थी वो  जज़्ब,

हर दिन रहता था      

बाहर आने का  इंतज़ार 

अपने चिकने  पन्नों पर

प्यारा सा कुछ

लिखे जाने का इंतज़ार I

 

 

अल्मारी  के बाहर

मौसम बदलते रहे

 साड़ियो की तहों में दबी        

डरी सहमी 

वो सुनती रही,

 चिल्लाना रोना बिलखना

और अल्मारी के अन्दर

साड़ियों की रंगत

भी फीकी पड़ती रही,   

और वो गुलाबी जिल्द वाली डायरी

जिसके चिकने पन्नों

में थी खुशनुमा छुअन

 मेहंदी लगे हाथों की

राह तकती रही I

 

कितने मौसम बदले यूं ही  

आज  उसे याद नहीं,

साड़ियों की क़ैद

जिल्द की गुलाबी रंगत

 पन्नों की खुशनुमा छुअन

सब बिसरी बातें हैं अब,

खुरदुरे हाथ लिखते हैं उसमे  

खर्चे का जमा घटा

न कोई ख्वाइश न शिकायत

न  कोई  इंतज़ार बचा

अब वो है  एक  

बिना जिल्द वाली

फटेहाल पुरानी  डायरी

 

मौलिक व् अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Jayprakash Mishra on October 6, 2015 at 8:07pm
Adarniya Pratibha ji ,Is bhaawpurn kavita k liye badhaai.
Comment by Santlal Karun on September 19, 2015 at 7:30pm

 आदरणीया प्रतिभा जी, अत्यंत संवेदनात्मक रचना के लिए हार्दिक साधुवाद एवं महीने की श्रेष्ठ रचना के चयन पर बधाई !"

Comment by Neeraj Neer on September 17, 2015 at 7:20pm

ओह! एक diary के बहाने स्त्री जीवन के विभिन्न आयामो का सुंदर चित्र उकेरा है आपने ... बहुत सुंदर कविता ... श्रेष्ठ कविता चुनी जाने की भी हार्दिक बधाई ... 

Comment by shashi bansal goyal on September 16, 2015 at 4:55pm
हार्दिक बधाई आपको । बहुत ही भावपूर्ण कविता है । सीधे दिल को छूने वाली ।
Comment by Sushil Sarna on September 16, 2015 at 4:04pm

कितने मौसम बदले यूं ही
आज उसे याद नहीं,
साड़ियों की क़ैद
जिल्द की गुलाबी रंगत
पन्नों की खुशनुमा छुअन
सब बिसरी बातें हैं अब,
खुरदुरे हाथ लिखते हैं उसमे
खर्चे का जमा घटा
न कोई ख्वाइश न शिकायत
न कोई इंतज़ार बचा
अब वो है एक
बिना जिल्द वाली
फटेहाल पुरानी डायरी

… अप्रतिम भावों की अप्रतिम रचना .... गर्म अहसासों से आगाज़ और धीरे धीरे हालात की गर्द में गुम होते जज़्बातों का दिल को टीस देता अंजाम .... आदरणीया प्रतिभा जी जिस ख़ूबसूरती से अपनी रूहानी अहसासों को लफ्ज़ दिए है वो काबिले तारीफ़ है … बन्दे की तरफ से आपकी कलम को सलाम सलाम सलाम _/\_

Comment by vijay nikore on September 16, 2015 at 3:21pm

अद्भुत ! अद्भुत ! आनन्द आ गया, आपकी कविता पढ़कर । हार्दिक बधाई, आदरणीया प्रतिभा जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 7, 2015 at 8:33pm

डायरी के सुन्दर  बिम्ब के आधार पर नारी का पूरा जीवन ही कविता में उतार दिया बहुत ही अच्छी प्रस्तुति आपको दिल से बधाई प्रतिभा जी | 

Comment by pratibha pande on August 25, 2015 at 1:07pm
आदरणीय गिरिराज जी ,आपने रचना पर आकर मेरा मान बढाया ,आपका हार्दिक आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2015 at 9:55am

ज़िन्दगी की सच्चाई बयान करती सुन्दर कविता के लिये आपको हार्दिक बधाई , आदरणीया प्रतिभा जी ॥

Comment by pratibha pande on August 25, 2015 at 8:41am
आ० डॉ गोपाल नारायण जी ,आपने रचना पर आकर मेरा मान बढाया ,आपका हार्दिक आभार

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