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गजल -आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है ।

कुछ भी हो,अपने मसीहा को बड़ा रखता है
आदमी अपनी ही मर्जी का खुदा रखता है
वो सरेआम हकीकत से मुकर जायेगा
गिरगिटों जैसी बदलने की अदा रखता है
तुम गरीबी को तो इनसान का गहना समझो
जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है ।
जुल्म पर जुल्म जो करता है यहाँ दुनिया में
उसके हिस्से में भी भगवान सजा रखता है ।
मार के कुंडली,खजाने पे अकेला बैठा
हक गरीबों का यहाँ सेठ दबा रखता है
एक दिन मैं तुझे आईना दिखा दूंगा "सुजान "
मेरे बारे में जो तू ख्याल बुरा रखता है ।

मौलिक व अप्रकाशित ।।

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Comment by सूबे सिंह सुजान on July 21, 2015 at 3:27pm
Vinay ji,आपका हार्दिक धन्यवाद ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 21, 2015 at 10:32am
बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है , बधाई आपको आदरणीय सूबे सिंह जी
Comment by विनय कुमार on July 20, 2015 at 8:40pm

// तुम गरीबी को तो इनसान का गहना समझो
जो फटेहाल है वो लब पे दुआ रखता है // , बहुत बढ़िया ग़ज़ल हुई है , बधाई आपको आदरणीय.

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