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आरती उतारूँ क्या?(छोटी बह्र की ग़ज़ल 'राज')

२१२ १२२ २

गली गली बुहारूँ क्या?

नालियाँ निथारूँ क्या ?

काम छोड़ कर अब मैं 

रास्ता निहारूँ क्या?

 

आसमां से उतरे हो  

आरती उतारूँ क्या?

 

धूल लग गई शायद

पाँव  भी पखारूँ क्या?

 

देखना है  चेह्रा  अब     

आईना सँवारूँ क्या?

 

लाए कुछ नए जुमले   

शब्द मैं सुधारूँ क्या? 

 

धूप लग रही क्या जी

अब्र को पुकारूँ क्या?

 

वोट मांगने आये 

पांच साल वारूँ क्या?  

 

स्याह क्यूँ हुई रंगत   

बोलिए निखारूँ क्या?

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 2, 2015 at 2:11pm

आसमां से उतरे हो  

आरती उतारूँ क्या?         वाह! वाह!

वाह आ० निराला  अंदाज अंत में सारे राज खुले! नमन्!

गली गली से कई बात और भी खुली शुक्रिया आ०!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2015 at 12:43pm

आ० धर्मेन्द्र ही,ग़ज़ल आपकी प्रतिक्रिया पाकर सार्थक हुई दिल से आभार आपका.  

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on July 2, 2015 at 12:11pm
बहुत खूब आदरणीया, छोटी बह्र खूब निभाई है आपने

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2015 at 9:50am

परी एम् श्लोक जी,बहुत- बहुत आभार  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 2, 2015 at 9:49am

राहुल जी ,आपका बहुत- बहुत शुक्रिया. 

Comment by Pari M Shlok on July 2, 2015 at 9:16am
बहुत सुन्दर

धूप लग रही क्या जी
अब्र को पुकारूँ क्या?
Comment by Rahul Dangi Panchal on July 2, 2015 at 8:01am
बहुत ही सुन्दर आदरणीय ।

आसमां से उतरे हो
आरती उतारूँ क्या?

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