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गज़ल - फिल बदीह --- वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है ( गिरिराज भंडारी )

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जो कहते थे उनको इशारा बहुत है

वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है

 

ऐ तन्हाई आ मेरी जानिब चली आ

कि यादों को तेरा सहारा बहुत है

 

तबीयत से इक फूँक भारो तो यारों

जलाने को दुनिया, शरारा बहुत है

 

ये मजहब का ठेका हटा लो यहाँ से 

सुकूँ के लिये भाई चारा बहुत है

 

फलक बोस इमारत उन्हें हो मुबारक    --- गगन चुम्बी 

मुझे टूटी छ्त का सहारा बहुत है

 

ऐ साक़ी सुबू तू पिला दे किसी को

मुझे जाम आँखो का प्यारा बहुत है

 

तेरा शुक्रिया ग़म हमेशा कहूंगा 

तपा के , रुला के , निखारा बहुत है 

 

मुझे और खुशियाँ न देना ख़ुदाया

मुझे एक तेरा नज़ारा बहुत है

**********************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 14, 2015 at 11:10pm

जिंदाबाद! जिंदाबाद! जिंदाबाद! गजल हुयी है!अभिनन्दन आदरणीय!

 

Comment by Rahul Dangi Panchal on June 14, 2015 at 10:18pm
आदरणीय गजल बहुत ही सुन्दर हुई है बधाई स्वीकार करें

पर आदरणीय
(मै तक़्सीम कर दूँ , मेरी सारी दौलत बाँट दूँ
मगर देश बांटूँ , गवारा नहीं है)
यह शे'र जो मैं नहीं समझ पाया यह तो तुकान्त से परे प्लीज मुझे समझाए सादर!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 6:16pm

आदरणीय वीनस भाई , एक लब्मे अरसे के बाद आपसे  '' खुश दिया '' मिला ।  मन प्रसन्न है । और अच्छा कह सकूँ इसका प्रयास करता रहूँगा । आपका बहुत आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 6:13pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 14, 2015 at 6:13pm

आदरणीया राजेश जी , हौअला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया , टंकण त्रुटि बताने का आभार ।

Comment by वीनस केसरी on June 14, 2015 at 3:02pm

वाह जनाबे आली दिल खुश कर दिया
बहुत प्यारी ग़ज़ल कही है

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 14, 2015 at 12:28pm

बहुत बढ़िया , बहुत सुन्दर अनुज

ऐ तन्हाई आ मेरी जानिब चली आ

कि यादों को तेरा सहारा बहुत है


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 14, 2015 at 12:05pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई आ० गिरिराज जी ,

जो कहते थे उनको इशारा बहुत है

वो सुनते नहीं कुछ , पुकारा बहुत है----वाह्ह्ह 

 

ऐ तन्हाई आ मेरी जानिब चली आ

कि यादों को तेरा सहारा बहुत है---क्या कहने 

तबीयत से इक फूँक भारो तो यारों--फूँक मारो ....टंकण त्रुटी को ठीक कर लें 

जलाने को दुनिया, शरारा बहुत है

 

 

फलक बोस इमारत उन्हें हो मुबारक    

मुझे टूटी छ्त का सहारा बहुत है---बहुत खूब 

दिल से बधाई आपको 

 

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