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" ज़रा इसको सिल कर बढ़िया पॉलिश कर देना "।
उसने सर हिला कर जूता ले लिया और साहब ने बड़े अनमने मन से वहाँ रखी टूटी चप्पल पैर में डाल ली ।
" लीजिये साहब , जूता ठीक हो गया ", पर उन्होंने जैसे ही पैर निकाला , मोज़ा चप्पल में लगी कील में फंस गया।
" कैसी चप्पल रखते हो तुम लोग ", नाराज़गी दिखाते हुए उन्होंने उसके बताये पैसों का आधा दिया और चल दिए।
वो अपनी टूटी चप्पल की कील दुरुस्त करते हुए सोच रहा था कि छेद मोज़े में हुआ था या नीयत में।
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on June 4, 2015 at 9:10pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय शुभ्रांशु पाण्डेय जी , सही कहा आपने .

Comment by Shubhranshu Pandey on June 4, 2015 at 8:18pm

आदरणीय विनय जी, 

सुन्दर कथा. चप्पल की कील ने नीयत में कील लगा दिया. 

सादर.

Comment by विनय कुमार on June 2, 2015 at 12:50pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी , आपके शब्द सम्बल प्रदान करते हैं हम जैसे नए लेखकों को |


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 2, 2015 at 11:57am

किसी सामान्य घटना से किसी भुक्तभोगी की मनोदशा एवं उसके भाव पकड़ना रचनाकार की पारखी दृष्टि के कारण संभव होता है. इस लघुकथा ने इस तथ्य को ही मुखर किया है.
लघुकथा अच्छी हुई है. शुभकामनाएँ आदरणीय विनयजी.

Comment by विनय कुमार on June 1, 2015 at 2:45pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on June 1, 2015 at 2:23pm

मन को छू लेने वाली रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय विनय जी

Comment by विनय कुमार on June 1, 2015 at 1:15pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी | आप ने सराहा , मनोबल बढ़ गया मेरा..

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:59am

बेहतरीन ......सुन्दर  मनोहारी प्रस्तुति . बधाई  आ० विनय जी.

Comment by विनय कुमार on May 31, 2015 at 3:03am

बहुत बहुत आभार आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी..

Comment by Shyam Narain Verma on May 30, 2015 at 4:23pm
अच्छी प्रस्तुति आदरणीय ,बधाई 

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