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ग़ज़ल -- मुझको सुकून-ए-दिल किसी दर पर नहीं मिला ( बराए इस्लाह )

२२१-२१२१-१२२१-२१२

दिल जिस से आशना हो वो मन्ज़र नहीं मिला
मैं तिश्नालब ही रह गया, सागर नहीं मिला

पथरीले रास्तों पे ही चलता रहा हूँ मैं
सफ़रे हयात में मुझे रहबर नहीं मिला

अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी
मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला

बुझते दियों को शब्दों से रोशन जो कर सके
महफ़िल में ऐसा कोई सुखनवर नहीं मिला

साहिल पे ही तू बैठ के क्या सोचे ए बशर
मेहनत बिना किसी को भी गौहर नहीं मिला

इसकी तलाश में हूँ मैं सदियों से दर-ब-दर
मुझको सुकून-ए-दिल किसी दर पर नहीं मिला

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by दिनेश कुमार on May 20, 2015 at 5:47am
आदरणीय समर कबीर सर जी, हौसला अफ़्जाई के लिए बहुत शुक्रिया। गलती सुधारने के लिए आभारी हूँ सर।
Comment by दिनेश कुमार on May 20, 2015 at 5:45am
शुक्रिया आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी।
Comment by shree suneel on May 19, 2015 at 10:49pm
मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला.. /
सही बात आदरणीय दिनेश जी. खु़द से मिलना बहुत जरूरी होता है. बहरहाल अच्छी ग़ज़ल हुई है. हार्दिक बधाई आपको.
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 19, 2015 at 8:59pm

वाह वाह ..बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on May 19, 2015 at 4:06pm

दिनेश जी,  बहुत बढ़िया.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 19, 2015 at 9:39am

अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी
मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला                वाह वाह वाह!! हासिल -ए-गज़ल शेर!

आ० दिनेश सर इस उम्दा गजल पर हार्दिक बधाई प्रेषित है!

Comment by वीनस केसरी on May 19, 2015 at 12:57am

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए ढेरो दाद हाज़िर है

समर साहब की इस्लाह पर गौर फरमाएं ...


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 18, 2015 at 11:11pm

आदरणीय दिनेश भाई जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है एक एक शेर कमाल का हुआ है मतले से लेकर आखिरी शेर तक बस कमाल हुआ है 

दिल से दाद हाज़िर है इस ग़ज़ल पर. 

Comment by Hari Prakash Dubey on May 18, 2015 at 11:01pm

  आ.   दिनेश कुमार जी  "मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला" ये पंक्ति बस दिल में अटककर  रह जाती है  .....बहुत सुन्दर  , बधाई   आपको  ! 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 18, 2015 at 10:58am

आदरणीय , बहुत उम्दा गज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ आपको ॥ 

अपनी बुराइयों से यूँ अन्जान हूँ अभी
मैं खुद से एक बार भी खुलकर नहीं मिला   -- बहुत बढ़िया बात कही , बधाई आपको ।

इसकी तलाश में हूँ मैं सदियों से दर-ब-दर ,   इस्स मिसरे को ,   जिसकी तलाश में हूँ मैं सदियों से दर-ब-दर ,  ऐसा कहना मुझे और अच्छा लग रहा है , आप भी सोच के देख लीजियेगा ॥

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