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एक सादा ग़ज़ल-नूर

२१२२/ २१२२/ २१२२/ २१२ 
.दिल में गर तूफां उठे तो मुस्कुराना है कठिन
याद करना है सरल पर भूल जाना है कठिन. 
.
यादों के झौंके पे झूले झूलना कुछ और है,
यादों के अंधड़ को लेकिन रोक पाना है कठिन.
.
हिचकियाँ आई यूँ ही होंगी तुझे नादान दिल!
भूलने वालों को तेरी याद आना है कठिन.
.
आड़ दो हाथों की पाकर सर उठा लेती है लौ,
हाँ खुली छत पर दीये का जगमगाना है कठिन.
.
कैसे कैसे लोग अब बसने लगे हैं शह्र में
अब लगे है यां भी अपना आब-ओ-दाना है कठिन.
.
ज़ह्न-ओ-दिल पर छाई हैं यूँ आजकल दुश्वारियाँ
ख्व़ाब में भी आपसे मिलना मिलाना है कठिन.
.  
दोष था मेरा जो मैंने सर किसी के मढ़ दिया    
जानता सबकुछ हूँ लेकिन मान पाना है कठिन.
.
फैज़ है, सब के दिलों में जल रही रौशनी,  
ज़ुल्म ये है, इस तपिश को आज़माना है कठिन.   


.
निलेश "नूर"
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 861

Comment

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Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2015 at 7:53am

शुक्रिया आ. मनोज जी..
याँ का प्रयोग यहाँ और वाँ का वहाँ के लिए किया जाता रहा है ..
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2015 at 7:52am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2015 at 7:51am

शुक्रिया आ. डॉ विजय शंकर  जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 7, 2015 at 7:51am

शुक्रिया आ. वीनस जी.
आप नियमित मेरी रचनाओं पर समय दे रहे हैं जिससे बहुत महीन बातें पता चल रही है ..
आप के सभी सुझाव स्वीकार हैं मुझे ..मक्ता फिलहाल के लिए हटा रहा हूँ..जबतक फिर से न कह सकूँ.
आड़ दो हाथों की पाकर सर उठा लेती है लौ ...कर दिया है ..
लोग कैसे कैसे आकर बस रहे हैं शह्र में... में मैं बस गए (process पूरी होने वाला) भाव नहीं देना चाहता था..
कैसे कैसे लोग अब बसने लगे हैं शह्र में कर दिया है ...
एक बार फिर आपका आभारी हूँ 

Comment by वीनस केसरी on May 7, 2015 at 1:33am

दिल में गर तूफां उठे तो मुस्कुराना है कठिन
याद करना है सरल पर भूल जाना है कठिन.  ......... बहुत खूब
.
यादों के झौंखे पे झूले झूलना कुछ और है,
यादों के अंधड़ को लेकिन रोक पाना है कठिन....... झोंके ... बढ़िया शेर
.
हिचकियाँ यूँ ही लगी होंगी तुझे नादान दिल!
भूलने वालों को तेरी याद आना है कठिन. .........हिचकियाँ आई यूँ ही होंगी तुझे नादान दिल!
.
आड़ दो हाथों की हो तो लौ खडी हो जाती है,
हाँ खुली छत पर दीये का जगमगाना है कठिन. ........... जम का पहलू झलक रहा है
.
लोग कैसे कैसे आकर बस रहे हैं शह्र में ..........बस गए हैं शहर में
अब लगे है यां भी अपना आब-ओ-दाना है कठिन.......................... बढ़िया शेर है

ज़ह्न-ओ-दिल पर छाई हैं यूँ आजकल दुश्वारियाँ .......ज़ह्न-ओ-दिल पर आजकल यूँ छाई हैं दुश्वारियाँ
ख्व़ाब में भी आपका मिलना मिलाना है कठिन...... आपका मिलना शब्द तो सही है मगर खुद को भी मिलाना है तो आपसे मिलना  मिलाना कहिये
.  
दोष था मेरा जो मैंने सर किसी के मढ़ दिया    
जानता सबकुछ हूँ लेकिन मान पाना है कठिन........... बढ़िया
.
फैज़ है, सब के दिलों में जल रही रौशनी,  
ज़ुल्म ये है, इस तपिश को आज़माना है कठिन.,,,,, बहुत खूब

. घेर रक्खा है तेरी यादों ने दिल को इस क़दर
अब लगे है ‘नूर’ इस का धडधडाना है कठिन.  ......... धड़कने के लिए धडधडाना किसी दशा में स्वीकार्य नहीं है .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 6, 2015 at 8:30pm

बहुत सुन्दर , 

बधाई , आदरणीय नीलेश भाई ॥

Comment by मनोज अहसास on May 6, 2015 at 8:18pm
बहुत खूब सर
आपको पढ़पढ़ कर ही मुझे सीखना है
यां का प्रयोग यहाँ के स्थान पर हुआ है क्या
सादर
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 6, 2015 at 6:29pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल, और इस शेर की तो बात ही कुछ और है,
आड़ दो हाथों की पाकर लौ खडी हो जाती है,
हाँ खुली छत पर दीये का जगमगाना है कठिन॥
बधाई आदरणीय नीलेश नूर जी , सादर।
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 5:56pm

शुक्रिया आ. श्याम जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 6, 2015 at 5:56pm

शुक्रिया मिथिलेश भाई.. आपका सुझाव हू-बहू मान लिया ..बस इसी लालच में तो यहाँ अपनी ग़ज़ले पोस्ट करते हैं सभी कि गुनीजनो की निगाह पड़ जाए और कॉपी चेक हो जाए.
अपनी मूल प्रति में बदलाव कर लिया है. यहाँ भी रात को एडिट कर लूँगा.
सादर 

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