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आँखों में बेबस मोती है …

आँखों में बेबस मोती है …

रात बहुत लम्बी है

ज़िंदगी बहुत छोटी है
पत्थरों के बिछोने पे
लोरियों की रोटी है
अब वास्ता ही नहीं
हाथों की लकीरों से
भूख बिलखती है पेट में
मुफलिसी साथ सोती है
आते ही मौसम चुनाव का
होठों पे हँसी होती है
राजनीति की जीत हमेशा
हम जैसों से ही होती है
हर चुनाव के भाषण में
नाम हमारा ही होता है
कुर्सी मिलते ही फिर से
फुटपाथ पे तकदीर होती है
संग होते हैं श्वान वही
वही भूखी रात होती है
रूठी हुई ज़िंदगी का 
आँखों में बेबस मोती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 5, 2015 at 7:34am

आदरणीय सुशील सरना जी वास्विकता को दर्शाती रचना मगर ये ही लोग हर बार गलत वोट डाल देते हैं क्यूँ ?...सादर 

Comment by Dr. Vijai Shanker on May 5, 2015 at 1:48am
बहुत सुन्दर प्रस्तुति, राजनीति का सही चित्र , बधाई आदरणीय सुशील सरना जी,सादर।
Comment by shree suneel on May 5, 2015 at 1:31am
हर चुनाव के भाषण में
नाम हमारा ही होता है
कुर्सी मिलते ही फिर से
फुटपाथ पे तकदीर होती है/
बिलकुल सही. . आदरणीय सुशील सरना सर, यथार्थ चित्रण.
बधाई हो..
Comment by Samar kabeer on May 4, 2015 at 11:30pm
जनाब सुशील सरना जी,आदाब,आज के आदमी की पीड़ा को अच्छे शब्दों में पिरोकर पेश किया है आपने,कविता जहाँ से मोड़ लेती है वह बहुत ख़ूब अंदाज़ है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |

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