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किसने कहा प्रेम अंधा होता है -- अतुकांत ( गिरिराज भंडारी )

किसने कहा प्रेम अंधा होता है

****************************

किसने कहा प्रेम अंधा होता है

रहा होगा उसी का , जिसने कहा

मेरा तो नहीं है

देखता है सब कुछ

वो महसूस भी कर सकता है

जो दिखाई नहीं देता उसे भी

वो जानता है अपने प्रिय की अच्छाइयाँ और

बुराइयाँ भी

वो ये भी जानता है कि ,

उसका प्रेम,  पूर्ण है ,

बह रहा है वो तेज़ पहाड़ी नदी के जैसे , अबाध

साथ मे बह रहे हैं ,

डूब उतर रहे हैं साथ साथ

व्यर्थ की भावनायें भी , कचरों के जैसे

प्रेम के साथ साथ, पर प्रेम से अलग

बिना भीगे उन व्यर्थ की भावनाओं से

जैसे कमल का पत्ता पानी रह के भी गीला नहीं होता

सब कुछ दिख रहा है , महसूस हो रहा है

उसे विश्वास है

सागर के प्रेम की पूर्णता पर भी

वो भी सब कुछ देखते हुये भी

समाहित कर लेगा खुद में,  सब कुछ के साथ

क्योंकि प्रेम होता है तो पूर्ण ही होता है

आधा अधूरा तो व्यापार होता हैं

******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 8:06pm

आदरनीय मिथिलेश भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 8:05pm

आदरणीय विजय भाई , आपके अनुमोदन से रचना का मान बढ़ गया , सराहना के लिये आपका आभारी हूँ ॥

Comment by MAHIMA SHREE on May 1, 2015 at 7:09pm

 सुंदर प्रस्तुति.. बधाई आपको, सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on May 1, 2015 at 6:42pm
आदरणीय गिरिराज सर

चकित हूँ इस रचना पर।
बस इतना कहूँगा आभार इस प्रस्तुति के लिए।
सहज प्रस्तुति का विस्तार देखते ही बन रहा है।
Comment by Dr. Vijai Shanker on May 1, 2015 at 6:24pm
बहुत ही सुन्दर , वैचारिक प्रस्तुति, प्रेम अंधा ( ? ) नहीं होता, अपने और अपने से सम्बंधित " सबकुछ " को बहुत गौर से देखता है, बस कभी कभी वही देखता रह जाता और कुछ नहीं देख पाता। आपने अपने पक्ष को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है , निसंदेह.
प्रसंगतः , एक बार विवेकानन्द जी से यही पूछा गया था , उनका उत्तर था , " प्रेम अंधा होता है तभी तो माँ अपने गर्भस्थ शिशु से बिना उसे देखे प्रेम करने लगती है "
वैसे सत्य वही होता है जिसका उल्टा भी सत्य होता है।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति, बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत , बहुत बहुत बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 2:38pm

आदरणीय समर कबीर भाई , आपको चिंतन से उपजी मेरी अतुकांत रचनायें पसंद आतीं है जान कर हार्दिक खुशी हुई । रचना की सराहना के लिये आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 1, 2015 at 2:36pm

आदरणीय कृष्णा भाई , रचना की सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ॥

Comment by Samar kabeer on May 1, 2015 at 2:31pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी,आदाब,आपकी अतुकांत कविताऐं सुन कर अतुकांत कविता के प्रति मेरी दिलचस्पी बढ़ती जा रही है,आपका लेखन मुझे बहुत पसंद है ,यह कविता भी बहुत पसंद आई,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं |
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on May 1, 2015 at 1:35pm

क्योंकि प्रेम होता है तो पूर्ण ही होता है

आधा अधूरा तो व्यापार होता है..

वाह आदरणीय! सच कहा आपने प्रेम आत्मिक रूप से पूर्ण ही होता है,वियोग में संताप होना अलग बात है!!नमन!

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